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ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे और मुगल सल्तनत के अंत की खूनी दास्तान

जानिए 20 सितंबर 1857 की वो दर्दनाक दास्तान, लाल किले से रंगून तक दिल्ली का पतन और अंतिम मुगल चिराग का बुझना

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Ranchi: तारीख 20 सितंबर 1857, यह महज कैलेंडर का एक पन्ना नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की वह काली लकीर है, जिसने एक विशाल सल्तनत के सुनहरे युग को हमेशा-हमेशा के लिए अतीत के पन्नों में दफन कर दिया। यह वही दिन था जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने दिल्ली पर अपना पूर्ण कब्जा जमा लिया और करीब सवा तीन सौ सालों से चले आ रहे मुगल साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी।
यह कहानी केवल राजनीतिक बदलाव की नहीं है, बल्कि यह कहानी है – एक बूढ़े शायर-बादशाह की बेबसी की, लाल किले के प्राचीर से बहते खून की और एक ऐसे शहर की जो रातों-रात मुशायरों के सुरमई माहौल से निकलकर श्मशान में तब्दील हो गया।

क्रांति की आग और दिल्ली की घेराबंदी

मई 1857 में जब मेरठ की छावनी से उठी बगावत की चिंगारी ने समूचे उत्तर भारत को अपनी चपेट में लिया, तो विद्रोही सिपाहियों के कदम दिल्ली की ओर बढ़ चले। 82 वर्ष की ढलती उम्र के लाचार और शायर मिजाज बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय को सिपाहियों ने जबरन ‘शहंशाह-ए-हिंद’ घोषित कर दिया। जफर के पास न तो अपनी विशाल सेना थी और न ही खजाना, फिर भी वह भारत की संप्रभुता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुके थे।
अंग्रेज अधिकारी भली-भांति जानते थे कि जब तक दिल्ली और लाल किले पर उनका नियंत्रण नहीं होता, तब तक वे इस जनक्रांति को कुचल नहीं सकते। इसके बाद शुरू हुआ दिल्ली की घेराबंदी का भयानक दौर। करीब चार महीनों तक दिल्ली की प्राचीरों पर हिंदुस्तानी सिपाहियों और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बीच कड़ा मुकाबला चलता रहा।

कश्मीरी गेट पर आखिरी धावा और खूनी जंग

सितंबर 1857 के आते-आते अंग्रेजों ने पंजाब और अन्य क्षेत्रों से नई तोपों और कुमुक (अतिरिक्त सेना) को इकट्ठा कर लिया। 14 सितंबर को जनरल निकोलसन की अगुवाई में कश्मीरी गेट को तोपों से उड़ाकर ब्रिटिश फौजें शहर के भीतर घुसीं। अगले छह दिनों तक दिल्ली की तंग गलियों और पुरानी इमारतों में भीषण और रोंगटे खड़े कर देने वाली जंग लड़ी गई।
शहर के आम नागरिकों ने भी विद्रोहियों का साथ दिया, लेकिन आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेजों ने हर गली को खून से पाट दिया। 17 सितंबर को हालात बिगड़ते देख बहादुर शाह जफर को लाल किला छोड़कर शहर के बाहरी इलाके में शरण लेनी पड़ी।

20 सितंबर 1857: लाल किले पर फहराया यूनियन जैक

आखिरकार 20 सितंबर 1857 की सुबह तक अंग्रेजों ने पुरानी दिल्ली के एक-एक हिस्से को अपने नियंत्रण में ले लिया। लाल किला, जो कभी शाहजहाँ के वैभव, कला और औधत्य का प्रतीक था, अब गोलियों और तोपों के धुओं से काला पड़ चुका था।
उसी शाम लाल किले पर सदियों पुराना मुगलों का परचम हटाकर ईस्ट इंडिया कंपनी का ‘यूनियन जैक’ फहरा दिया गया। यह औपचारिक ऐलान था कि अब हिंदुस्तान की तकदीर का फैसला दिल्ली के तख्त से नहीं, बल्कि लंदन से होगा।

हुमायूं के मकबरे से गिरफ्तारी और खूनी दरवाजा का मंजर

बादशाह जफर ने अपने परिवार के साथ हुमायूं के मकबरे में शरण ले रखी थी। लेकिन अंग्रेजों का खुफिया तंत्र मजबूत था। 21 सितंबर को बेरहम अंग्रेज मेजर विलियम हडसन अपने घुड़सवारों के साथ हुमायूं के मकबरे को घेरने पहुंचा। जान बख्शने के वादे पर जफर ने अपनी बेगम ज़ीनत महल के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।

खूनी दरवाजे की बर्बरता:

अगले ही दिन, हडसन ने बादशाह के दो बेटों मिर्जा मुगल और मिर्जा खिज्र सुल्तान और पोते मिर्जा अबू बक्र को बंदी बनाकर लाल किले की ओर लाया। दिल्ली गेट के पास हडसन ने तीनों शहजादों के कपड़े उतरवाए और उन्हें सरेआम गोलियों से भून डाला। उनके खून से सने शवों को कोतवाली के सामने तमाशा बनाकर रख दिया गया, ताकि फिर कोई अंग्रेजों के खिलाफ सिर उठाने की हिम्मत न कर सके।

तबाही के मुहाने पर दिल्ली

दिल्ली पर कब्जा जमाने के बाद अंग्रेजों ने जो तांडव मचाया, वह इतिहास का एक काला अध्याय है। कई हफ्तों तक शहर में कत्लेआम और लूटपाट चलती रही। हजारों बेगुनाह नागरिकों को फांसी पर लटका दिया गया या फिर गोलियों से भून दिया गया। चांदनी चौक, जो कभी व्यापार और रौनकों का केंद्र था, खंडहर और लाशों के ढेर में तब्दील हो गया।

रंगून में अंतिम सांसें और एक युग का अंत

82 वर्षीय बहादुर शाह जफर पर अंग्रेजों ने लाल किले में ही मुकदमा चलाया और उन्हें देशद्रोही घोषित कर बर्मी सीमा (अब म्यांमार) के रंगून शहर में निर्वासित कर दिया। 7 अक्टूबर 1858 को एक साधारण बैलगाड़ी पर बैठकर भारत का अंतिम सम्राट हमेशा के लिए अपनी महबूब दिल्ली को अलविदा कह गया।
रंगून की एक सीलन भरी कोठरी में बंदी के रूप में दिन बिताते हुए, 7 नवंबर 1862 को इस महान शायर ने अपनी अंतिम सांस ली। अपनी वतन वापसी की तड़प को जफर ने अपनी मशहूर पंक्तियों में दर्ज किया था:
“कितना है बदनसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।”
20 सितंबर 1857 की घटना ने न सिर्फ एक वंशानुगत हुकूमत का खात्मा किया, बल्कि भारत को आधिकारिक तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी के अंधकार में धकेल दिया, जो अगले 90 वर्षों तक जारी रहा।
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