Spiritual Adda: सूर्यपुत्र शनिदेव न्याय के देवता हैं। हालांकि लोग उनके कोप से भयभीत रहते हैं, पर वह हमेशा ही इंसान के कार्यों के अनुरूप परिणाम देते हैं। सामान्य तौर पर शनिदेव के वाहन के रूप में कौवे का ध्यान आता है, लेकिन उनके कौवे सहित कुल 9 वाहन हैं, जिनमें से कई को ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व के अनुसार बेहद शुभ माना गया है। इसके बावजूद यह जरूरी नहीं है कि वे सभी आपके लिए भी शुभ ही हों। इसलिए यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि कौन सा वाहन शुभ है और कौन सा अशुभ।
कौवा
शनि देव का सबसे प्रमुख वाहन कौवा माना जाता है। यह न्याय, सतर्कता और कर्मफल का प्रतीक है।भैंसा
भैंसा शक्ति, स्थिरता और धैर्य का प्रतीक माना जाता है।मोर
मोर सुंदरता, विवेक और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।शेर
शेर साहस, पराक्रम और नेतृत्व क्षमता का प्रतीक माना जाता है।सियार
सियार चतुराई, सावधानी और परिस्थितियों को समझने की क्षमता का प्रतीक है।हाथी
हाथी शक्ति, समृद्धि, गरिमा और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।घोड़ा
घोड़ा गति, ऊर्जा, परिश्रम और सक्रियता का प्रतीक है।गधा
गधा मेहनत, सहनशीलता और निरंतर कर्म करने की भावना का प्रतीक माना जाता है।हंस
हंस ज्ञान, विवेक, पवित्रता और सत्य-असत्य में भेद करने की क्षमता का प्रतीक है।
शनिदेव के 9 वाहन और गणना की विधि
शास्त्रों के अनुसार, शनि जिस वाहन में सवार होकर किसी व्यक्ति की कुंडली में प्रवेश करते हैं, उसकी राशि की गणना करके यह तय होता है कि उनका आगमन व्यक्ति के लिए अच्छा है या बुरा।
इस गणना की विधि सुनने में कठिन लगती है, लेकिन यह गणित के सूत्रों की तरह एकदम तय है। इसके लिए जन्म नक्षत्र की संख्या और शनि के राशि बदलने की तिथि के नक्षत्र की संख्या को जोड़कर उसके योगफल को नौ से भाग करना होता है। इस गणना से मिली संख्या के आधार पर ही शनि का वाहन निर्धारित होता है। एक दूसरी विधि भी है; इसमें शनि के राशि प्रवेश करने की तिथि की संख्या, नक्षत्र संख्या, वार संख्या और नाम के प्रथम अक्षर की संख्या…इन सभी को जोड़कर योगफल को 9 से भाग दे दिया जाता है। जो शेष संख्या आती है, वह शनि के वाहन की जानकारी देती है। दोनों विधियों में यदि शेष 0 बचे, तो यह मानना चाहिए कि आपकी अपेक्षित संख्या 9 है।
सूर्य देव का विशाल परिवार
रविवार को सूर्यदेव का दिन माना जाता है और यश व सम्मान हासिल करने के लिए लोग उनकी पूजा करते हैं। सूर्य देव का परिवार काफी बड़ा है। उनकी संज्ञा और छाया नाम की दो पत्नियां और दस संताने हैं, जिनमें यमराज और शनिदेव जैसे पुत्र तथा यमुना जैसी बेटियां शामिल हैं। मनुस्मृति के रचयिता वैवस्वत मनु भी सूर्यपुत्र ही हैं।
संज्ञा और छाया: सूर्य देव की दो पत्नियां संज्ञा और छाया थीं। संज्ञा सूर्य का तेज न सह पाने के कारण अपनी छाया को उनकी पत्नी के रूप में स्थापित करके तप करने चली गई थीं। लंबे समय तक छाया को ही अपनी प्रथम पत्नी समझकर सूर्य उनके साथ रहे। बाद में देव शिल्पी विश्वकर्मा (जो संज्ञा के पिता थे) ने सूर्य देव को इस बात की जानकारी दी।
संज्ञा की संतानें: संज्ञा से सूर्य को जुड़वां अश्विनीकुमारों सहित कुल छह संतानें हुईं।
छाया की संतानें: छाया से सूर्य की चार संतानें हुईं।
सूर्यदेव की प्रमुख संताने और उनकी कथाएं
यमराज (धर्मराज): यमराज सूर्य के सबसे बड़े पुत्र और संज्ञा की प्रथम संतान हैं।
यमी (यमुना): यमुना सूर्य की दूसरी संतान और ज्येष्ठ पुत्री हैं, जो अपनी माता संज्ञा को सूर्यदेव से मिले आशीर्वाद के चलते पृथ्वी पर नदी के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
वैवस्वत मनु: सूर्य और संज्ञा की तीसरी संतान वैवस्वत मनु वर्तमान (सातवें) मन्वन्तर के अधिपति हैं, जो प्रलय के बाद संसार के पुनर्निर्माण करने वाले प्रथम पुरुष बने और जिन्होंने मनुस्मृति की रचना की।
शनिदेव: छाया और सूर्य की प्रथम संतान शनिदेव हैं, जिन्हें कर्मफल दाता और न्यायधिकारी भी कहा जाता है। जन्म से ही शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे, लेकिन भगवान शंकर के वरदान से वे नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर नियुक्त हुए।
तप्ति: छाया और सूर्य की कन्या तप्ति का विवाह अत्यंत धर्मात्मा सोमवंशी राजा संवरण के साथ हुआ। कुरुवंश के संस्थापक राजर्षि कुरु इन्हीं दोनों की संतान थे।
विष्टि (भद्रा): सूर्य और छाया पुत्री विष्टि भद्रा नाम से नक्षत्र लोक में प्रविष्ट हुई। इनका रूप भयंकर और स्वभाव कड़क बताया गया है। इनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही ब्रह्मा जी ने इन्हें पंचांग के प्रमुख अंग ‘विष्टि करण’ में स्थान दिया।
सावर्णि मनु: सूर्य और छाया की चौथी संतान सावर्णि मनु हैं, जो वैवस्वत मनु की ही तरह अगले यानी आठवें मन्वन्तर के अधिपति होंगे।
अश्विनीकुमार (नासत्य और दस्त्र): सूर्य जब घोड़ा बनकर अश्विनी (घोड़ी) के रूप में रह रही संज्ञा के पास गए, तो उनके संयोग से जुड़वां अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई, जो देवताओं के वैद्य माने जाते हैं।
रेवंत: सूर्य की सबसे छोटी और संज्ञा की छठी संतान रेवंत हैं, जो उनके पुनर्मिलन के बाद जन्मे और निरंतर भगवान सूर्य की सेवा में रहते हैं।




