रांची: बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और तेजी से गिरते भूगर्भ जलस्तर की दोहरी चुनौती से निपटने के लिए झारखंड सरकार ने पर्यावरण और जल संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक नीतिगत निर्णय लिया है। मंगलवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में झारखंड मंत्रालय (प्रोजेक्ट भवन) में आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में बहुप्रतीक्षित ‘झारखंड वेस्ट वाटर (अमेंडमेंट) पॉलिसी, 2026’ (Jharkhand Waste Water Amendment Policy, 2026) के गठन के प्रस्ताव को प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इस संशोधित नीति का मूल उद्देश्य राज्य के शहरी और औद्योगिक अंचलों से निकलने वाले अपशिष्ट जल (गंदे पानी) के वैज्ञानिक उपचार, पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) और उसके पुन: उपयोग (रियूज) को कानूनी व संस्थागत रूप देना है।
पुरानी नीति में बदलाव क्यों बना अनिवार्य?
झारखंड में पूर्व में लागू अपशिष्ट जल नीति के कई प्रावधान बदलते समय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के सख्त मानकों के अनुसार पर्याप्त नहीं रह गए थे। राज्य की स्वर्णरेखा, दामोदर, हरमू और कोयल जैसी प्रमुख नदियों में बिना उपचारित किए सीधे गिरते सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट ने जल स्रोतों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया था। इसके साथ ही, शहरों में गर्मियों के दिनों में पेयजल की भारी किल्लत और भूजल का अत्यधिक दोहन गंभीर समस्या बन चुका है।
संशोधित नीति-2026 के तहत अब यह अनिवार्य किया गया है कि शहरों में उत्पन्न होने वाले सीवेज और अपशिष्ट जल को आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के जरिए शोधित किया जाए और उस उपचारित जल का शत-प्रतिशत उपयोग औद्योगिक इकाइयों, निर्माण कार्यों, बागवानी, पार्कों के रखरखाव और थर्मल पावर प्लांटों के कूलिंग सिस्टम में सुनिश्चित किया जाए।
संशोधित नीति के प्रमुख प्रावधान और जमीनी प्रभाव
- उद्योगों पर ताजे पानी की निर्भरता में कटौती: भारी उद्योगों और खदानों को अब गैर-पेयजल उपयोगों के लिए उपचारित अपशिष्ट जल (Treated Waste Water) का उपयोग करना होगा, जिससे प्राकृतिक जल स्रोतों पर दबाव कम होगा।
- बड़ी सोसायटियों में डिसेंट्रलाइज्ड एसटीपी: बड़े आवासीय परिसरों, मॉल, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए इन-हाउस वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट सिस्टम स्थापित करने के नियमों को अधिक व्यावहारिक और कड़ा बनाया गया है।
- नगरीय निकायों को वित्तीय अवसर: नगर निगमों और पालिकाओं को उपचारित जल को उद्योगों को बेचकर राजस्व अर्जित करने का कानूनी ढांचा उपलब्ध होगा, जिससे निकायों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी।
पर्यावरण संतुलन और भावी पीढ़ियों के लिए वरदान
जल संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए जलस्रोतों का निर्माण पर्याप्त नहीं है; प्रयुक्त हो चुके जल का पुनर्चक्रण ही भविष्य की जल सुरक्षा का एकमात्र टिकाऊ समाधान है। झारखंड कैबिनेट का यह फैसला न केवल राज्य को देश के उन चुनिंदा राज्यों की कतार में खड़ा करता है जिनके पास आधुनिक अपशिष्ट जल नीति है, बल्कि यह ‘सर्कुलर वाटर इकोनॉमी’ और स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण में क्रांतिकारी साबित होगा।





