रांची : रांची विश्वविद्यालय (RU) के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के अखड़ा में शनिवार को डॉ. करमा उरांव की 74वीं जयंती मनाई गई। इस मौके पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने उनके चित्र पर फूल चढ़ाकर उन्हें नमन किया। साथ ही आदिवासी समाज, भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए उनके कार्यों को याद किया।
वक्ताओं ने कहा कि डॉ. करमा उरांव ने आदिवासी समाज के अधिकारों और पहचान के लिए जीवनभर संघर्ष किया। वह पारंपरिक पड़हा व्यवस्था, आदिवासी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए हमेशा सक्रिय रहे।
नेतरहाट में 10 हजार छात्रों के साथ किया था घेराव
कार्यक्रम के दौरान डॉ. करमा उरांव के पुराने आंदोलनों की भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने बताया कि एकीकृत बिहार के समय नेतरहाट में कैबिनेट की बैठक होती थी। इसी दौरान डॉ. करमा उरांव ने करीब 10 हजार विद्यार्थियों के साथ नेतरहाट का घेराव किया था।
इस आंदोलन का उद्देश्य छात्रों की मांगों को सरकार तक पहुंचाना था। उनकी प्रमुख मांगों में रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग खोलना भी शामिल था। इसके अलावा रांची के ऑड्रे हाउस में एकीकृत बिहार का मिनी सचिवालय संचालित कराने में भी उनका योगदान रहा।
आदिवासी भाषा और संस्कृति बचाने का दिया संदेश
समारोह में वक्ताओं ने कहा कि डॉ. करमा उरांव का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए लगातार काम किया।
वक्ताओं ने युवाओं से अपनी मातृभाषा, परंपरा और संस्कृति को आगे बढ़ाने की अपील की। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ पारंपरिक ज्ञान को भी अपनाना जरूरी है। ऐसा करना ही डॉ. करमा उरांव के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कृषि मंत्री समेत कई लोगों ने दी श्रद्धांजलि
कार्यक्रम में झारखंड की कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, शांति तिर्की और प्रो. हरि उरांव सहित कई लोग मौजूद रहे। सभी ने डॉ. करमा उरांव को श्रद्धांजलि दी और आदिवासी समाज के लिए किए गए उनके कार्यों की सराहना की।
वक्ताओं ने कहा कि डॉ. करमा उरांव के विचार और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा, संस्कृति और अधिकारों के प्रति जागरूक करते रहेंगे।



