Lucknow: उत्तर प्रदेश को चार अलग-अलग राज्यों में बांटने की बहस एक बार फिर सियासी गलियारों में छिड़ गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने देवरिया में एक जनसभा के दौरान दावा किया कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में विभाजित होगा। इसके साथ ही उन्होंने सियासी दांव चलते हुए कहा कि पूर्वांचल राज्य का गठन होते ही राजभर समाज का व्यक्ति वहां का मुख्यमंत्री बनेगा। हालांकि, यूपी के बंटवारे की मांग उठाने वाले राजभर पहले नेता नहीं हैं; बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती भी अपने शासनकाल में इसकी पुरजोर वकालत कर चुकी हैं।
नवंबर 2011 में मायावती ने विधानसभा से पास कराया था प्रस्ताव
उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन को लेकर सबसे ठोस कदम नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने उठाया था। उस समय बसपा सरकार ने राज्य को चार हिस्सों—पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्यांचल में बांटने का औपचारिक प्रस्ताव विधानसभा में पेश कर उसे ध्वनिमत से पारित कराया था। इस प्रस्ताव को विधिवत मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा गया था। मायावती का तर्क था कि भौगोलिक रूप से विशाल राज्य होने के कारण दूरदराज के इलाकों तक विकास और योजनाओं का लाभ ठीक से नहीं पहुंच पाता, इसलिए बेहतर कानून-व्यवस्था और चुस्त प्रशासनिक नियंत्रण के लिए छोटे राज्यों का गठन जरूरी है।
सत्ता की हिस्सेदारी और जातिगत समीकरणों पर टिका राजभर का रुख
मायावती के प्रशासनिक मॉडल के मुकाबले ओमप्रकाश राजभर की ताजा मांग पूरी तरह से जातिगत लामबंदी और सियासी नफा-नुकसान पर टिकी नजर आती है। राजभर ने नए राज्य की वकालत के साथ ही सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपने समाज का दावा ठोक दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका यह रुख प्रशासनिक सुधार से ज्यादा पूर्वांचल में अपनी पार्टी का जनाधार मजबूत करने और चुनावी रणनीति के तहत सत्ता में बड़ी भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश है।
प्रशासनिक प्रक्रिया बनाम चुनावी बयानबाजी का फर्क
दोनों नेताओं की मांग में सबसे बुनियादी अंतर उनके तौर-तरीकों का है। मायावती ने संविधान के दायरे में रहते हुए कैबिनेट और विधानसभा से प्रस्ताव पास कराकर इसे एक वैधानिक प्रक्रिया का रूप दिया था। इसके उलट, ओमप्रकाश राजभर का बयान फिलहाल एक राजनीतिक मंच से दिया गया चुनावी दावा भर है। भले ही दोनों नेता सूबे को चार टुकड़ों में बांटने की बात कर रहे हों, लेकिन मायावती का प्रशासनिक एजेंडा और राजभर की सियासी महत्वाकांक्षा दोनों के रास्ते और नीयत में बड़ा अंतर साफ दिखाती है।




