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काशी का अक्खड़पन: होली के बाद ‘बुढ़वा मंगल’ की धूम, सुरों से महके घाट

वाराणसी — जब पूरे देश में होली की रंग-बिरंगी खुमारी उतरने लगती है, तब बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में एक और उत्सव ‘बुढ़वा मंगल’ का शंखनाद होता है। होली के ठीक बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को मनाया जाने वाला यह त्योहार बनारस की

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वाराणसी — जब पूरे देश में होली की रंग-बिरंगी खुमारी उतरने लगती है, तब बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में एक और उत्सव ‘बुढ़वा मंगल’ का शंखनाद होता है। होली के ठीक बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को मनाया जाने वाला यह त्योहार बनारस की सदियों पुरानी फक्कड़पन वाली संस्कृति का जीवंत उदाहरण है। यह सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, संगीत और बुजुर्गों के प्रति अटूट सम्मान का वो जश्न है, जिसमें गंगा की लहरें भी सुरों में बहने लगती हैं।

‘बुढ़वा मंगल’ का अर्थ ही काशी की तहजीब का सार है। यह दिन घर और मोहल्ले के बुजुर्गों को समर्पित होता है। बनारसी लोग देवी-देवताओं के साथ-साथ अपने वृद्धजनों के चरणों में अबीर-गुलाल अर्पित कर उनका आशीर्वाद लेते हैं। स्थानीय निवासी प्रभुनाथ त्रिपाठी बताते हैं कि होली का हुड़दंग यहां आकर शांति और भक्ति में बदल जाता है। इस दिन के बाद गुलाल-अबीर को अगले साल तक के लिए विदा कर दिया जाता है।

बजड़ों पर संगीत और परंपरा का संगम — उत्सव का मुख्य केंद्र गंगा के घाट होते हैं। दशाश्वमेध से लेकर अस्सी घाट तक फूलों से सजे ‘बजड़े’ (बड़ी नावें) तैरते नजर आते हैं। गद्दे, मसनद और इत्र की खुशबू से महकते इन बजड़ों पर संगीत की महफिलें जमती हैं। एक समय था जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई और गिरिजा देवी की चैती यहां रातभर गूंजती थी। आज भी वही परंपरा कायम है, जहां लोकगायक होरी, चैती, ठुमरी और बिरहा के जरिए मां गंगा और हनुमान जी के चरणों में अपनी कला की हाजिरी लगाते हैं।

विदेशी सैलानियों का जमावड़ा — इस खास मौके का लुत्फ उठाने के लिए भारी संख्या में सात समंदर पार से भी सैलानी काशी पहुंचते हैं। कुल्हड़ वाली ठंडई, बनारसी मिठाइयां और बजड़ों पर सजी संगीत की शाम सैलानियों को एक अलग ही दुनिया का अहसास कराती है। बुढ़वा मंगल काशी का वो अनोखा रंग है, जहां बनारस का अक्खड़पन और आध्यात्मिकता एक साथ मिलकर गंगा की धारा में बहते हैं।

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