पटना: बिहार के गांवों में अब बैंकिंग केवल बैंकों की शाखाओं तक सीमित नहीं रह गई है। जीविका की ‘बैंक सखियां’ माइक्रो-एटीएम और डिजिटल उपकरणों की मदद से घर-घर जाकर बैंकिंग सुविधाएं पहुंचा रही हैं। इससे समय, दूरी और झिझक की समस्या खत्म हुई है और ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
आंकड़ों में बैंक सखियों की सफलता:
सक्रिय नेटवर्क: राज्य के सभी 38 जिलों, 531 प्रखंडों और 4,688 पंचायतों में 6,771 बैंक सखियां कार्यरत हैं, जिनमें से 6,735 आईआईबीएफ (IIBF) द्वारा प्रमाणित हैं।
खाते और लेन-देन: इन सखियों के जरिए अब तक 14.33 लाख से अधिक बैंक खाते खोले जा चुके हैं और 23,200 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार हुआ है।
महिला ग्राहकों का भरोसा: बैंक सखी केंद्रों पर आने वाले ग्राहकों में करीब 67 प्रतिशत महिलाएं हैं। परिचित दीदियों के होने से महिलाओं में बचत और वित्तीय लेन-देन को लेकर भरोसा बढ़ा है।
उद्यमिता और सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा: बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट (BCA) के रूप में काम करते हुए इन दीदियों ने अब तक लगभग 57.95 करोड़ रुपये का कमीशन अर्जित किया है। बैंक सखी बनने के बाद इनमें वित्तीय जागरूकता भी बढ़ी है—सर्वेक्षण के मुताबिक, 48.81% ने बीमा, 41.67% ने ऋण सुविधा और 31.75% ने पेंशन योजनाओं को अपनाया है।
मंत्री का बयान: ग्रामीण विकास एवं सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि यह मॉडल महिला सशक्तिकरण और स्वावलंबन का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि 6,700 से अधिक बैंक सखियों ने यह साबित कर दिखाया है कि अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर ग्रामीण महिलाएं न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि पूरी वित्तीय व्यवस्था को मजबूत कर सकती हैं।




