Tel Aviv: इजराइल में अब टकराव सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी खाकी वर्दी और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों के बीच तनाव बढ़ रहा है। ‘नाजी’ जैसे शब्दों ने विवाद को और भड़का दिया है। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच यह झड़प इजराइल के बीचोंबीच हो रही है। वहीं, नेतन्याहू की सत्ता में धार्मिक दलों की अहम भूमिका इस टकराव को और पेचीदा बना रही है। यहां सफेद कमीज, काली फेडोरा टोपी और लंबे काले कोट पहने सैकड़ों अति-रूढ़िवादी यहूदी सैन्य पुलिस के सामने खड़े हैं।
सैन्य सेवा से इनकार और झड़प की शुरुआत
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विवाद की शुरुआत यरूशलम और तेल अवीव के बीच स्थित मोदिइन शहर की एक इमारत से शुरू हुई। यहां एक युवा अति-रूढ़िवादी यहूदी रहता है, जिसने इजराइल के नियमों के मुताबिक अनिवार्य सैन्य सेवा में हाजिर होने से इनकार कर दिया था। पुलिस इसी सिलसिले में उसे गिरफ्तार करने पहुंची थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर की शुरुआत के इस घटनाक्रम जैसी कई घटनाएं पिछले कुछ महीनों में सामने आई हैं, जिन्होंने इजराइली समाज में मौजूद एक गहरी दरार को और उजागर कर दिया है।
यह बढ़ती दरार ऐसे समय में सामने आ रही है, जब इजराइल कई मोर्चों पर लड़ रहा है, इनमें गाजा में हमास के खिलाफ जारी संघर्ष भी शामिल है। इसके अलावा कब्जे वाले वेस्ट बैंक में फलस्तीनियों के खिलाफ चरमपंथी यहूदी बस्तियों के लोगों की हिंसा भी बढ़ रही है। कभी एक छोटा अल्पसंख्यक समूह रहे अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी आज भी एक अलग समुदाय के तौर पर रहते हैं, हालांकि उनकी संख्या हर साल बढ़ रही है। अभी अनुमान है कि वे इजराइल की कुल आबादी का करीब 14 फीसदी हैं। इस समुदाय में जन्म दर भी दूसरे इजराइलियों के मुकाबले काफी ज्यादा है। अगर उनकी आबादी इसी रफ्तार से बढ़ती रही, तो 2050 तक वे यहूदी इजराइली आबादी का एक-तिहाई हिस्सा हो सकते हैं।
राजनीतिक समीकरण और भविष्य की चुनौतियां
अब इस अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी समुदाय को एक छोटा और महत्वहीन अल्पसंख्यक समूह नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही उन पर इजराइल के व्यापक समाज के साथ ज्यादा जुड़ने का दबाव भी बढ़ रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था इस समय के दो अहम मुद्दे हैं। ऐसे में अति-रूढ़िवादी यहूदियों और उन ज्यादातर इजराइलियों के बीच मतभेद पहले से कहीं ज्यादा गहरे हो गए हैं, जो मानते हैं कि अति-रूढ़िवादी समुदाय देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में अपनी उचित हिस्सेदारी नहीं निभा रहा है।
मौजूदा किसी भी राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना नहीं है। वहीं पीएम नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य भी अनिश्चित है। ऐसे में छोटी पार्टियों, जिनमें हरेदी पार्टियां भी शामिल हैं, उनकी भूमिका एक बार फिर अहम हो सकती है। ये पार्टियां तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं कि इजराइल में अगली सरकार किसकी बनेगी। सत्ता में बने रहने की कोई भी उम्मीद रखने के लिए नेतन्याहू को अति-रूढ़िवादी पार्टियों का समर्थन बनाए रखना होगा, भले ही इजराइल में उनके विशेष दर्जे को कम करने की मांग लगातार बढ़ रही हो।





