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Beijing, (China): पिछले आठ वर्षों से चीन को अपना घर समझने वाली एक भारतीय महिला के लिए वहां की शिक्षा व्यवस्था किसी चक्रव्यूह से कम साबित नहीं हुई। महिला के पति चीनी नागरिक हैं, इसके बावजूद वह अपने बेटे का दाखिला एक अच्छे किंडरगार्टन (बालवाड़ी) में कराने में नाकाम रहीं। हार मानकर अब इस महिला ने अपने बच्चे के भविष्य के लिए भारत लौटने का बड़ा फैसला लिया है। यह मामला चीन की बेहद जटिल और दमघोंटू प्रतिस्पर्धा वाली शिक्षा प्रणाली की पोल खोलता है।
चीन में बच्चों की पढ़ाई को लेकर माता-पिता इस कदर गंभीर हैं कि वे बच्चे के जन्म से पहले ही स्कूलों की तलाश शुरू कर देते हैं। यहां एडमिशन प्रक्रिया केवल फॉर्म भरने या परीक्षा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘हुकौ’ (Hukou) नामक स्थानीय निवास पंजीकरण प्रणाली पर टिकी है। यह सिस्टम तय करता है कि किस बच्चे को किस इलाके के स्कूल में जगह मिलेगी। यदि आपके पास उस विशेष क्षेत्र का ‘हुकौ’ नहीं है, तो किसी सरकारी स्कूल में दाखिला मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
‘स्कूल डिस्ट्रिक्ट हाउस’ का मायाजाल और भारी खर्च
चीन में अच्छे स्कूलों के आसपास घर खरीदने की होड़ मची रहती है, जिसे ‘स्कूल डिस्ट्रिक्ट हाउस’ कहा जाता है। लोग स्कूलों के पास प्रॉपर्टी खरीदने के लिए करोड़ों रुपये फूंक देते हैं क्योंकि एडमिशन के लिए स्थानीय पते के दस्तावेज अनिवार्य होते हैं। कई प्रतिष्ठित स्कूलों का नियम है कि परिवार को उस इलाके में कम से कम एक से तीन साल तक रहना ही होगा। ‘जिन्जिन रूक्स्यू’ (Xinjin Ruxue) नीति के तहत बच्चों को केवल पास के स्कूलों में ही भेजा जाता है, जिससे बाहरी लोगों के लिए विकल्प खत्म हो जाते हैं।
इंटरनेशनल स्कूलों की फीस छू रही आसमान
सरकारी स्कूलों में फीस कम है लेकिन वहां ‘हुकौ’ की दीवार खड़ी है। दूसरी ओर, निजी और इंटरनेशनल स्कूलों में सुविधाएं तो विश्वस्तरीय हैं, लेकिन उनका खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर है। किंडरगार्टन स्तर पर ही निजी स्कूलों की फीस लाखों में है, जबकि इंटरनेशनल स्कूलों का सालाना खर्च 15 से 30 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। विदेशी नागरिकों के लिए कुछ सरकारी स्कूलों में जगह तो है, लेकिन वहां पढ़ाई का माध्यम पूरी तरह मंदारिन भाषा (Mandarin) है। इन्हीं बाधाओं और नियमों के मकड़जाल ने एक भारतीय मां को अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है।
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