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हिमालय पर बढ़ता बोझ बना खतरा, बचाने के लिए उठी बड़ी मांग

हिमालय जिस पर भारत चीन भूटान नेपाल पाकिस्तान अफगानिस्तान और मेमनार की 1.4 अब से ज्यादा लोग निर्भर करते हैं उन सब के लिए हिमालय एशिया का वॉटर टावर के रूप में जाना जाता है लेकिन जिस तरह से इसकी जॉब विविधताओं को भारी नुकसान

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हिमालय जिस पर भारत चीन भूटान नेपाल पाकिस्तान अफगानिस्तान और मेमनार की 1.4 अब से ज्यादा लोग निर्भर करते हैं उन सब के लिए हिमालय एशिया का वॉटर टावर के रूप में जाना जाता है लेकिन जिस तरह से इसकी जॉब विविधताओं को भारी नुकसान पहुंचाया गया जिस तरह से ऐसे स्थान में जहां जल प्रवाह का स्थल था जल जमाव का स्थल था या जैविक विविधता का स्तर था वहां पर घर बनाए गए वहां पर व्यापारिक प्रतिष्ठान बनाए गए और भारी मात्रा में आमदनी के लिए पैसा कमाने के लिए पर्यटन के नाम पर हिमालय की तबाही की गई और यह जानते हुए की हिमालय एक नया पहाड़ है ग्रोइंग पहाड़ है यह चट्टानों का पहाड़ नहीं है फिर भी इस पर बेवजह लोड डाला गया। पूरे क्षेत्र में डाला गया ,जिससे जलवायु परिवर्तन पर ग्लोबल वार्मिंग पर भी असर पड़ा है और इको टूरिज्म के नाम पर ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने के बजाय इसकी तबाही के कारण बने । नेपाल में ग्लेशियर का पिघलना और उससे जुड़े हुए क्षेत्र की तबाही इस बात का वह सबूत है कि मनुष्य प्रकृति का दोहन कर रहा है इन सभी चीजों को देखते हुए मैनेजमेंट स्टडी रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष और पर्यावरण विद शशी भूषण विश्वकर्मा ने संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव को एक पत्र लिखा है कि हिमालय की जैव विविधता एवं प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए हिमालय पर निर्भर सभी देशों की एक संयुक्त समिति बने जो नागरिकों द्वारा संचालित हो जहां कोई भी घटना दुर्घटना होती हो नागरिकों द्वारा एक दूसरे को सूचित किया जाए तथा हिमालय की प्राकृतिक छवि है उसको संरक्षित रखने में नागरिकों की भूमिका हो अपनी प्रति की प्रति उन्होंने संबंधित देशों के राज्य अध्यक्ष को भी दिया है

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