फॉण्ट कनवर्टर NEW

प्लास्टिक का धांसू विकल्प: मक्के के छिलके से कप-स्ट्रॉ, मिला सरकार का साथ

मुजफ्फरपुर के इंजीनियर नाज ओजैर ने मक्के के बेकार समझे जाने वाले छिलकों से कप, प्लेट और स्ट्रॉ जैसे इको-फ्रेंडली उत्पाद बनाने का अनोखा आविष्कार किया है। केंद्र सरकार से पेटेंट प्राप्त इस स्टार्टअप से पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों और युवाओं को रोजगार मिल

अपनी भाषा में पढ़ें

Patna: पर्यावरण के लिए नासूर बन चुके सिंगल-यूज प्लास्टिक और खानपान में लगातार घुल रहे माइक्रोप्लास्टिक के खतरों से निपटने के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर से एक बेहद अनूठी और क्रांतिकारी पहल सामने आई है। मुजफ्फरपुर जिले के कुढ़नी प्रखंड के छितरौली पंचायत अंतर्गत मुरादपुर निवासी युवा इंजीनियर नाज ओजैर ने मक्के के उन छिलकों से पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) उत्पाद तैयार कर दिखाए हैं, जिन्हें अमूमन किसान बेकार समझकर फेंक देते थे। इन छिलकों से चाय के कप, प्लेट, कटोरी, ग्लास, स्ट्रॉ (नली) और पर्यावरण-अनुकूल झोले जैसे उत्पाद तैयार कर उन्होंने प्लास्टिक का एक मजबूत और बेहतरीन विकल्प ढूंढ निकाला है।

5 साल की लंबी रिसर्च और केंद्र सरकार से मिला पेटेंट

इंजीनियर नाज के इस सफर में सफलता रातोंरात नहीं आई। इसके पीछे उनके पांच वर्षों की कड़ी मेहनत और अटूट संघर्ष की कहानी जुड़ी है। प्लास्टिक के बर्तनों से इंसानी सेहत पर पड़ रहे बुरे प्रभावों को भांपते हुए उन्होंने सबसे पहले बांस, केला और पपीते के रेशों पर शोध करना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने मक्के के छिलकों पर प्रयोग किए और एक खास निश्चित तापमान पर गर्म करके उन्हें सांचे में ढालने की अनूठी तकनीक विकसित की। अपने इस प्रयोग में उन्होंने पाया कि इस प्रक्रिया से बने बर्तन एक बार आकार में ढल जाने के बाद अपनी शेप नहीं बदलते। उनके इस शानदार नवाचार को 1 मार्च 2019 को पेटेंट के लिए आवेदन मिला था, जिसके बाद 21 फरवरी 2024 को उन्हें आधिकारिक पेटेंट प्रमाण पत्र हासिल हुआ। इसके बाद 26 मई 2026 को उन्होंने ‘एमएनओ स्वदेशी इंडिया प्रा. लि.’ नाम से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की।

किसानों की बढ़ी आमदनी और स्थानीय युवाओं को मिला रोजगार

ग्रामीण विकास विभाग और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत इस तरह के नवाचारों को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। इंजीनियर नाज किसानों से मक्के का बेकार छिलका करीब 1 से 2 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदते हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी हो रही है। एक उत्पाद को तैयार करने में महज 45 से 50 पैसे की लागत आती है, जिसे बाजार में लगभग 2 रुपये प्रति पीस की दर से बेचा जाता है। वर्तमान में इस स्टार्टअप के जरिए उनकी सालाना शुद्ध आमदनी करीब 5 लाख रुपये है। उनकी इस छोटी सी फैक्ट्री में इलाके के आठ स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार भी मिला हुआ है। उनका लक्ष्य आगामी 10 वर्षों में सिंगल-यूज प्लास्टिक के कम से कम 100 उत्पादों को पूरी तरह से इन इको-फ्रेंडली विकल्पों से रिप्लेस करना है।

सरकार दे रही है ग्रामीण प्रतिभाओं को पूरा प्रोत्साहन

इस पूरे मामले पर ग्रामीण विकास विभाग और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के अभिनव प्रयोग बिहार को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। मक्के के छिलके से पर्यावरण-अनुकूल बर्तन तैयार करना बेहद सराहनीय प्रयास है। सरकार कृषि अपशिष्ट (एग्रीकल्चर वेस्ट) से मूल्य संवर्धन करने वाली और ग्रामीण प्रतिभाओं को निखारने वाली हर योजना को हरसंभव मदद मुहैया कराने के लिए पूरी तरह तत्पर है।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram