रांची: इतिहास के पन्नों में 30 अक्टूबर की तारीख केवल एक सामान्य दिन नहीं, बल्कि भारतीय कूटनीति और वैश्विक इतिहास का वह ऐतिहासिक मोड़ है, जिसने पूरी दुनिया में भारत के कद को नई पहचान दी। वर्ष 1945 में आज ही के दिन भारत आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र (UN) का सदस्य बना था। हैरानी और गर्व की बात यह है कि उस समय भारत अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था और ब्रिटिश हुकूमत की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। इसके बावजूद, एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने से लगभग दो साल पहले ही भारत ने दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्था के संस्थापक सदस्य के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन और वह ऐतिहासिक हस्ताक्षर
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में शांति और सुरक्षा बहाल करने के उद्देश्य से एक ऐसी संस्था की नींव रखी जा रही थी, जो मानव जाति को तीसरे विश्व युद्ध की विभीषिका से बचा सके। 26 जून 1945 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में संयुक्त राष्ट्र का घोषणा-पत्र (UN Charter) तैयार हुआ।
इस वैश्विक सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सर आरकोट रामास्वामी मुदलियार कर रहे थे। उन्होंने 50 देशों के साथ मिलकर यूएन चार्टर पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद जब चार्टर की कानूनी पुष्टि की प्रक्रिया पूरी हुई, तो ठीक 30 अक्टूबर 1945 को भारत को आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता प्रदान कर दी गई।
उपनिवेश होते हुए भी क्यों मिली संस्थापक सदस्यता?
अक्सर यह सवाल जेहन में आता है कि जो देश खुद गुलाम था, वह दुनिया की संप्रभु सरकारों की संस्था का शुरुआती सदस्य कैसे बना? दरअसल, इसके पीछे दो बड़े कारण थे:
- द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का अप्रतिम योगदान: मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ते हुए 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने यूरोप, अफ्रीका और एशिया के मोर्चों पर अपना लहू बहाया था। इस सैन्य और मानवीय योगदान को तत्कालीन महाशक्तियां नजरअंदाज नहीं कर सकती थीं।
- लीग ऑफ नेशंस का इतिहास: भारत प्रथम विश्व युद्ध के बाद गठित हुई ‘लीग ऑफ नेशंस’ का भी मूल सदस्य था। इसलिए जब संयुक्त राष्ट्र की रूपरेखा बनी, तो भारत की मौजूदगी को शुरुआत से ही अनिवार्य माना गया।
रंगभेद के खिलाफ लड़ाई से लेकर वैश्विक शांति की मशाल तक
संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने के बाद भारत ने कभी भी केवल एक मूकदर्शक की भूमिका नहीं निभाई। आजादी के तुरंत बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने संयुक्त राष्ट्र को उपनिवेशवाद और रंगभेद के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बनाया।
1946 में भारत दुनिया का पहला देश था जिसने दक्षिण अफ्रीका की नस्लभेदी ‘रंगभेद नीति’ का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र महासभा में उठाया। इतना ही नहीं, 1953 में भारत की विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष चुनी गईं, जो पूरे एशिया और महिला नेतृत्व के लिए ऐतिहासिक गौरव का क्षण था।
शांति सेना (UN Peacekeeping) का सबसे मजबूत स्तंभ
जब-जब दुनिया के किसी कोने में युद्ध की आग भड़की, भारत ने हमेशा ‘शांति के दूत’ के रूप में हाथ आगे बढ़ाया। कोरियाई संकट (1950) से लेकर कांगो, साइप्रस, सोमालिया, लेबनान और सूडान तक भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे अधिक सैनिक भेजे हैं। भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और मानवीय दृष्टिकोण से अशांत क्षेत्रों में शांति स्थापित की, जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र आज भी भारत का कायल है।
1945 की सदस्यता से स्थायी सीट की दावेदारी तक
1945 में एक औपनिवेशिक देश के रूप में प्रवेश करने वाला भारत 80 से अधिक वर्षों के सफर में वैश्विक महाशक्ति बन चुका है। आज 140 करोड़ से अधिक की आबादी, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और तकनीकी रूप से अग्रणी राष्ट्र होने के नाते भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता (Permanent Seat) का सबसे मजबूत और स्वाभाविक दावेदार है।
भारत का स्पष्ट मानना है कि 1945 के दौर की विश्व व्यवस्था अब बदल चुकी है। अगर संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी में प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे सुरक्षा परिषद में सुधार करना होगा और भारत जैसे अग्रणी देशों को उनका वास्तविक स्थान देना होगा। 30 अक्टूबर 1945 का वह ऐतिहासिक दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र हमेशा से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) और वैश्विक शांति रहा है।





