Ranchi news: झारखंड में राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। हमर अधिकार मंच के सचिव एवं आरटीआई कार्यकर्ता चन्द्रदेव कुमार वर्णवाल ‘चंदू’ ने आरोप लगाया है कि राज्य सूचना आयुक्तों के चयन से संबंधित जानकारी मांगने के बावजूद कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग सूचना उपलब्ध नहीं करा रहा है। उन्होंने इसे सूचना के अधिकार अधिनियम की भावना के विपरीत बताते हुए विभागीय रवैये पर गंभीर आपत्ति जताई है।

चन्द्रदेव वर्णवाल ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन देकर राज्य सूचना आयुक्त पद के लिए चयनित अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, उपलब्धियां, वर्तमान व्यवसाय, चयन प्रक्रिया तथा आवेदन के साथ संलग्न प्रमाण-पत्रों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। यह सूचना उन अभ्यर्थियों से संबंधित थी, जिनके नाम राज्य सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति के लिए राज्यपाल को भेजे जाने की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने आई थी।

निर्धारित समयावधि में सूचना उपलब्ध नहीं कराए जाने पर उन्होंने प्रथम अपील दायर की। इस मामले की सुनवाई गुरुवार को प्रथम अपीलवाद संख्या-20/2026 के तहत प्रोजेक्ट भवन स्थित संयुक्त सचिव एवं प्रथम अपीलीय प्राधिकारी अमर कुमार के कार्यालय में हुई।

सुनवाई के दौरान विभाग की ओर से मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। आरटीआई कार्यकर्ता के अनुसार पहले संबंधित अधिकारियों ने कहा कि चयन प्रक्रिया से जुड़ी संचिका उनके पास उपलब्ध नहीं है। बाद में बताया गया कि संबंधित फाइल राजभवन (लोक भवन) में है। सुनवाई के दौरान उपस्थित अन्य विभागीय अधिकारियों ने भी यही तर्क दोहराया।

चन्द्रदेव वर्णवाल ने सवाल उठाया कि यदि चयन प्रक्रिया से संबंधित संचिका राजभवन में है, तो फिर कार्मिक विभाग ने 10 जून 2026 को चार राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की अधिसूचना किस आधार पर जारी की। उनका कहना है कि जिस संचिका के आधार पर नियुक्ति संबंधी अधिसूचना जारी की गई, उसी संचिका से जुड़ी जानकारी मांगे जाने पर उसे उपलब्ध नहीं कराना संदेह पैदा करता है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से यह कहा गया कि राज्य सूचना आयुक्तों के शपथ ग्रहण के बाद सूचना उपलब्ध कराई जाएगी। जबकि सूचना का अधिकार अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो नियुक्ति या शपथ ग्रहण तक चयन प्रक्रिया से संबंधित अभिलेखों को रोके रखने की अनुमति देता हो, विशेषकर तब जब मामला सार्वजनिक हित और संस्थागत पारदर्शिता से जुड़ा हो।

हमर अधिकार मंच के अध्यक्ष दीपेश निराला ने कहा कि राज्य सूचना आयुक्त का पद सूचना के अधिकार और प्रशासनिक पारदर्शिता की रक्षा से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। ऐसे पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए ताकि जनता का विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं में बना रहे। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अंजलि भारद्वाज बनाम भारत संघ तथा नमित शर्मा बनाम भारत संघ जैसे मामलों में सूचना आयोगों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर बल दिया है।

दीपेश निराला ने यह भी कहा कि यदि विभाग के पास मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं थी या उसे उपलब्ध कराने की तैयारी नहीं थी, तो गिरिडीह से लगभग 220 किलोमीटर की दूरी तय कर अपीलकर्ता को रांची बुलाने का कोई औचित्य नहीं था। उनके अनुसार यह आम नागरिकों के समय, श्रम और संसाधनों की अनदेखी है तथा सूचना अधिकार कानून की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।

हमर अधिकार मंच ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले को आगे भी उठाएगा और सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत उपलब्ध कानूनी विकल्पों का उपयोग करते हुए राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक कराने का प्रयास जारी रखेगा। मंच ने मांग की है कि चयन प्रक्रिया से संबंधित सभी अभिलेखों और मानकों को सार्वजनिक किया जाए ताकि नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

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