चैनपुर (गुमला): विद्यालयों में आयोजित होने वाली खेलकूद प्रतियोगिताओं का उद्देश्य बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना होता है। लेकिन यदि ऐसे आयोजनों में ही बच्चों की सुरक्षा से समझौता किया जाए, तो यह न केवल चिंता का विषय है बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। चैनपुर प्रखंड में आयोजित प्रखंड स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता के दौरान ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसने बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर बहस छेड़ दी है। जानकारी के अनुसार, तबेला स्कूल के छोटे-छोटे छात्र-छात्राओं को एक सवारी वाहन से प्रतियोगिता स्थल तक लाया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वाहन में उसकी निर्धारित क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया गया था। इतना ही नहीं, कुछ बच्चे वाहन के केबिन और ऊपरी हिस्से (छत) पर बैठे हुए भी दिखाई दिए। बच्चों से पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि उनके लिए वाहन की व्यवस्था विद्यालय के शिक्षक कमलकांत द्वारा की गई थी। बताया जा रहा है कि विद्यालय से खेल मैदान तक की दूरी लगभग 33 किलोमीटर है। इतने लंबे सफर में यदि बच्चों को इस प्रकार असुरक्षित तरीके से ले जाया गया, तो यह सुरक्षा मानकों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि रास्ते में अचानक वाहन अनियंत्रित हो जाता, तेज ब्रेक लग जाता या कोई सड़क दुर्घटना हो जाती, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता? क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानकों का पालन किया गया था? क्या वाहन निर्धारित क्षमता के अनुरूप था? क्या विद्यालय या संबंधित अधिकारियों ने बच्चों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था की थी? ऐसे कई सवाल अब चर्चा का विषय बने हुए हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों ने क्या देखा?
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि वाहन में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया गया था। कुछ बच्चे वाहन के अंदर बैठे थे, जबकि कुछ बच्चे वाहन के केबिन और छत पर बैठे नजर आए। यह दृश्य देखने के बाद कई लोगों ने इसे बेहद खतरनाक बताते हुए नाराजगी जताई। लोगों का कहना है कि स्कूल प्रशासन और जिम्मेदार शिक्षकों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए था। हालांकि, यह समाचार प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और मौके पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। यदि संबंधित पक्ष का कोई अलग पक्ष सामने आता है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
क्या कहते हैं मोटर वाहन अधिनियम के नियम?
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 तथा केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के अनुसार किसी भी वाहन में उसकी निर्धारित क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाना कानून का उल्लंघन माना जाता है। इसी प्रकार यात्रियों, विशेषकर बच्चों, को वाहन की छत पर बैठाकर ले जाना प्रतिबंधित और दंडनीय है। इन नियमों का उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली जनहानि को रोकना और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ओवरलोडिंग तथा छत पर यात्रा करने की स्थिति में दुर्घटना की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
स्कूलों के लिए भी हैं स्पष्ट सुरक्षा दिशानिर्देश
स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के सुरक्षित परिवहन के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति की सिफारिशों तथा विभिन्न राज्यों के स्कूल बस सुरक्षा दिशा-निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि विद्यालयों की जिम्मेदारी केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को सुरक्षित तरीके से विद्यालय और कार्यक्रम स्थल तक पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी है। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार स्कूलों को ऐसे वाहनों का उपयोग करना चाहिए जो सुरक्षा मानकों के अनुरूप हों। बच्चों को ओवरलोड वाहन या छत पर बैठाकर ले जाना सुरक्षा नियमों की भावना के विपरीत माना जाता है।
प्रशासनिक निगरानी पर भी सवाल
यह प्रतियोगिता प्रखंड स्तरीय थी, जिसमें विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। ऐसे आयोजनों में शिक्षा विभाग, आयोजन समिति और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी भी बनती है कि बच्चों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जाए। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रतियोगिता स्थल तक पहुंचने वाले वाहनों का निरीक्षण किया जाता, तो इस प्रकार की स्थिति को रोका जा सकता था। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या आयोजन से पहले या दौरान किसी अधिकारी ने परिवहन व्यवस्था की जांच की थी?
यदि दुर्घटना हो जाती तो जिम्मेदार कौन होता?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी लापरवाही के कारण बच्चों के साथ कोई दुर्घटना होती है, तो परिस्थितियों के अनुसार वाहन चालक, वाहन मालिक, विद्यालय प्रबंधन तथा संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। ऐसे मामलों में प्रशासनिक जांच के बाद आवश्यक कानूनी कार्रवाई भी संभव है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सौभाग्य से इस बार कोई दुर्घटना नहीं हुई, लेकिन भविष्य में ऐसी लापरवाही किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। उनका कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के मामले में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।
संबंधित पक्ष का पक्ष नहीं मिल सका
इस पूरे मामले में शिक्षक कमलकांत, तबेला स्कूल के प्रबंधन तथा संबंधित शिक्षा विभाग के अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका।
यदि उनका पक्ष प्राप्त होता है तो उसे भी निष्पक्षता के साथ प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
जांच और कार्रवाई की मांग
घटना के बाद स्थानीय लोगों ने जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ), प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी (बीईईओ) तथा जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि जांच में नियमों की अनदेखी और लापरवाही की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही यह भी मांग की गई है कि भविष्य में प्रखंड, जिला अथवा राज्य स्तर पर आयोजित किसी भी शैक्षणिक एवं खेलकूद कार्यक्रम में छात्रों के परिवहन के लिए स्पष्ट सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किए जाएं। प्रत्येक विद्यालय को सुरक्षित एवं मानक के अनुरूप वाहन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी तय की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी बच्चे की जान जोखिम में न पड़े।
बच्चों की सुरक्षा केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है। यदि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोग ही सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते दिखाई दें, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन इस मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करते हैं या यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों तक सीमित रह जाएगा।




