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बरेली में बड़ा खुलासा: सिटी मजिस्ट्रेट ऑफिस बना ‘ब्राह्मण राजनीति’ का अड्डा?

Bareilly (UP): उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में सिटी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात रहे अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा केवल एक सरकारी कर्मचारी का पद छोड़ना नहीं है, बल्कि यह शासन और खुफिया तंत्र की बड़ी नाकामी का जीवंत उदाहरण बन गया है। प्रशासनिक गलियारों

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Bareilly (UP): उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में सिटी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात रहे अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा केवल एक सरकारी कर्मचारी का पद छोड़ना नहीं है, बल्कि यह शासन और खुफिया तंत्र की बड़ी नाकामी का जीवंत उदाहरण बन गया है। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि कैसे एक वरिष्ठ अधिकारी अपने कार्यालय का इस्तेमाल एक विशिष्ट वर्ग को संगठित करने के लिए करता रहा और सरकार को इसकी भनक तक नहीं लगी।

दफ्तर में होती थीं ‘रणनीति’ वाली बैठकें

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अलंकार अग्निहोत्री पिछले काफी समय से ब्राह्मण समाज को एकजुट करने के मिशन पर काम कर रहे थे। हैरान करने वाली बात यह है कि सिटी मजिस्ट्रेट जैसे संवेदनशील पद पर रहते हुए वे अपने सरकारी दफ्तर में ही समाज के नेताओं और युवाओं के साथ नियमित बैठकें किया करते थे। व्हाट्सएप ग्रुप्स और डिजिटल माध्यमों के जरिए उन्होंने एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर लिया था। हाल ही में बरेली के जीआईसी ऑडिटोरियम में मालवीय जयंती पर हुए भव्य कार्यक्रम ने उनकी इस ‘समानांतर पहचान’ को जनता के बीच स्थापित कर दिया।

इंटेलिजेंस फेल्योर पर उठी उंगलियां

अग्निहोत्री के इस कदम ने उत्तर प्रदेश की स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि जब एक मजिस्ट्रेट अपने ही दफ्तर में सामाजिक और राजनीतिक बैठकों का दौर चला रहा था, तब इंटेलिजेंस के पास कोई इनपुट क्यों नहीं था? इसे शासन स्तर पर एक बड़ी विफलता माना जा रहा है। माना जा रहा है कि 26 जनवरी को दिए गए इस इस्तीफे की पटकथा कई महीने पहले ही लिखी जा चुकी थी।

आरक्षण और सामाजिक समीकरणों के बीच इस्तीफा

यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब देश में आरक्षण और यूजीसी के नए नियमों को लेकर बहस छिड़ी हुई है। जानकारों का मानना है कि अलंकार अग्निहोत्री अब पूरी तरह से सामाजिक या राजनीतिक सक्रियता की ओर रुख कर सकते हैं। शासन ने अब इस पूरे ‘इंटेलिजेंस फेल्योर’ की समीक्षा शुरू कर दी है और कयास लगाए जा रहे हैं कि लापरवाही बरतने वाले खुफिया अधिकारियों पर जल्द ही गाज गिर सकती है। यह मामला अब यूपी के प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता और प्रोटोकॉल पर एक नई बहस को जन्म दे रहा है।

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