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बागबेड़ा में क्यों नहीं मिल रहा पानी? योजना पर उठे नए चौंकाने वाले सवाल

Jamshedpur news: जमशेदपुर के बागबेड़ा हाउसिंग कॉलोनी में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि यह वही कॉलोनी है जिसके लिए पिछले कई वर्षों में करोड़ों रुपये की जलापूर्ति योजना बनाई गई, फाइलें आगे बढ़ीं, फंड जारी हुआ, पाइपलाइन

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Jamshedpur news: जमशेदपुर के बागबेड़ा हाउसिंग कॉलोनी में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि यह वही कॉलोनी है जिसके लिए पिछले कई वर्षों में करोड़ों रुपये की जलापूर्ति योजना बनाई गई, फाइलें आगे बढ़ीं, फंड जारी हुआ, पाइपलाइन बिछाने से लेकर फिल्टर प्लांट निर्माण तक के आदेश जारी हुए… लेकिन आज भी शहर की करीब 20,000 की आबादी स्वच्छ पीने के पानी के लिए परेशान है।

सुबोध झा के आरोपों से उभरा बड़ा सवाल

बागबेड़ा महानगर विकास समिति के अध्यक्ष और भाजपा जिला मुख्यालय प्रभारी सुबोध झा ने मंगलवार को सामने आकर इस पूरी योजना पर गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा है कि जलापूर्ति योजना “विभाग और पंचायत दोनों के लिए सोने का अंडा देने वाली मशीन” बन चुकी है और असली लाभ आम जनता को बिल्कुल नहीं मिला। उनके मुताबिक, 1140 घरों के लिए शुरू हुई पहली योजना में 1 करोड़ 10 लाख रुपये पाइपलाइन के लिए खर्च हुए, फिर 21 लाख 63 हजार का एक और आवंटन हुआ, और हाल ही में 1 करोड़ 88 लाख रुपये का फिल्टर प्लांट स्वीकृत हुआ। इतना पैसा खर्च होने के बावजूद कॉलोनी में अब तक एक भी बूंद स्वच्छ पानी नहीं पहुंचा।

2015 से चल रहा “एक दूसरे पर दोष” का खेल

सुबोध झा कहते हैं कि विभाग और पंचायत 2015 से एक-दूसरे को दोष देते आए हैं। पीने के पानी की समस्या के बीच यह आरोप-प्रत्यारोप अब जनता की आंखों के सामने खुलकर दिख रहा है। उन्होंने बताया कि योजना की संरचना शुरू से ही खामी से भरी रही। सबसे हैरान करने वाली बात यह कि 20,000 आबादी वाले क्षेत्र के लिए केवल 20,000 गैलन क्षमता का फिल्टर प्लांट बनाया गया, जबकि कॉलोनी में पहले से 50,000 गैलन क्षमता की टंकी मौजूद है। झा का आरोप है कि यह योजना जानबूझकर छोटे पैमाने पर रखी गई, ताकि आवंटित फंड का उपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा हो सके।

कॉलोनी की बढ़ती आबादी, लेकिन योजना ‘पुरानी स्केल’ पर

बागबेड़ा हाउसिंग कॉलोनी की पुरानी आबादी लगभग 9,000 थी। अब आधुनिक विस्तार के साथ यह संख्या 3,300 मकानों तक पहुंच चुकी है। इतनी बढ़ती आबादी के बाद भी योजना को पुरानी संरचना के पैमाने पर ही सीमित रखा गया। झा के अनुसार, “इससे स्पष्ट है कि या तो योजना की तकनीकी समझ नहीं है या फिर जानबूझकर इसे कमजोर रखा गया।”

पंचायत पर अवैध वसूली और कनेक्शन देने का आरोप

सुबोध झा के सबसे गंभीर आरोप अवैध वसूली को लेकर हैं।
उनका कहना है कि—
• पंचायत हर घर से 100 रुपये मासिक लेती है
• साथ ही 1050 रुपये सुरक्षा शुल्क भी लेती है
• पर इसका कोई हिसाब जनता को नहीं दिया जाता

सूचना के अधिकार (RTI) में भी उन्हें कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया। यह भी आरोप है कि कई घरों को अवैध जल कनेक्शन भी दिए गए, जिनकी जानकारी न विभाग को है, न पंचायत इसे सार्वजनिक करती है।

हाई कोर्ट का हस्तक्षेप, फिर भी अधूरी योजना

झा ने बताया कि इन्हीं शिकायतों के बाद मजबूरन झारखंड हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। कोर्ट ने 26 जुलाई 2024 तक काम पूरा करने का आदेश दिया था। लेकिन, आज तक योजना पूरी नहीं हुई।

“जनता पानी खरीदकर पीने को मजबूर”

उन्होंने कहा कि विभाग और पंचायत दोनों मिलकर जनता को “बुड़बक” बना रहे हैं। लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए 25–30 रुपये प्रति बोतल पानी खरीदने को मजबूर हैं। कुछ घरों में तो महीने का पानी खर्च 1500–2000 रुपये तक पहुंच गया है।

सीबीआई जांच की मांग

सुबोध झा ने साफ कहा— “यह मामला किसी विभागीय जांच से नहीं सुलझने वाला। करोड़ों रुपये के फंड का गबन और भ्रष्टाचार इसमें शामिल दिख रहा है। अब एकमात्र रास्ता है—सीबीआई जांच।” उन्होंने मांग की कि योजना का संचालन पंचायत से हटाकर किसी स्वतंत्र एजेंसी जैसे जुस्को या पेयजल विभाग को दिया जाए।

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