Interesting News: आज की दुनिया में टेक्नोलॉजी ने बहुत कुछ आसान कर दिया है, लेकिन इसके साथ एक नई समस्या भी आ खड़ी हुई है- दिमाग का ओवरलोड। अनियमित दिनचर्या, स्क्रीन पर बढ़ता समय और काम की भागदौड़ ने मानसिक थकान को एक आम चीज बना दिया है। लोग दिखते तो ठीक हैं, पर भीतर से लगातार दबाव में जी रहे हैं। इसी बीच एक तरीका ऐसा है, जो बिना दवाइयों के मन को हल्का कर देता है- आर्ट थेरेपी।

ताहिरा कश्यप की आर्ट थेरेपी वाली कहानी

फिल्ममेकर और लेखिका ताहिरा कश्यप खुद आर्ट थेरेपी को अपना सबसे बड़ा सहारा मानती हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो के साथ अपना अनुभव साझा किया और बताया कि बस आंखें बंद करके या बिना सोचे रंग भरना ही कितना सुकून दे देता है।

ताहिरा ने लिखा कि कला में कोई नियम नहीं। काली आउटलाइन बनाओ और अपने मन के हिसाब से रंग भरो- चटक रंग, छोटे बिंदु, हल्की धारियाँ, जो मन करे वो बना लो। कभी-कभी तो सिर्फ हाथों को बहने दो, सोचो ही मत। इसी बहाव में सबसे सुंदर कला निकलती है और दिमाग अपने आप हल्का हो जाता है।

उन्होंने अपनी एक पेंटिंग को देखते हुए कहा कि हमारा अंदरूनी अहसास कागज पर खुद-ब-खुद उतर आता है। उनका कहना है कि कलाकार वही नहीं जो परफेक्ट बनाता है, बल्कि वो जो बिना डर के दिल से बनाता है।

क्यों असर करती है आर्ट थेरेपी?

साइकोलॉजिस्ट भी मानते हैं कि आर्ट थेरेपी तनाव, चिंता और डिप्रेशन को कम करने का एक बहुत प्रभावी तरीका है। रंगों से खेलना, ड्रॉइंग बनाना, या मिट्टी से कुछ बनाना- ये सब दिमाग को आराम देता है और भीतर जमा भावनाओं को बाहर निकालने में मदद करता है। थोड़े ही समय में मन शांत होने लगता है और भीतर एक नई ऊर्जा महसूस होती है। यही वजह है कि आजकल आर्ट थेरेपी सिर्फ बच्चों या कलाकारों के लिए नहीं, बल्कि हर उम्र के लोगों के लिए सुझाई जा रही है।

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