रांची: आज जब भी किसी खास दावत, महफिल या शाही खान-पान की बात होती है, तो सबसे पहला नाम बिरयानी का आता है। खुशबूदार बासमती चावल, मसालों का अनोखा तालमेल और धीमी आंच पर पका मांस, बिरयानी केवल एक पकवान नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए एक जज्बा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस बिरयानी को आज हम इतने चाव से खाते हैं, उसकी शुरुआत किसी शाही जश्न से नहीं, बल्कि मुग़ल सेना के जवानों की सेहत और पोषण को ध्यान में रखकर हुई थी?
बिरयानी के इतिहास से जुड़ी सबसे प्रचलित और दिलचस्प ऐतिहासिक दास्तानों में से एक मुग़ल बादशाह शाहजहां की बेगम मुमताज महल (1593–1631) से जुड़ी हुई है, जिनकी याद में मोहब्बत की ऐतिहासिक निशानी ‘ताजमहल’ तामीर किया गया था।
जब मुमताज महल पहुंचीं सैनिकों की छावनी
इतिहासकारों और पुरानी किंवदंतियों के अनुसार, एक बार मलिका-ए-हिंद मुमताज महल मुग़ल सेना की छावनियों (बैरकों) के औचक निरीक्षण पर निकली थीं। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि देश की सीमाओं की हिफाजत करने वाले बहादुर मुग़ल सैनिक बेहद कमजोर, थके हुए और कुपोषित नजर आ रहे हैं। युद्ध के मैदान में फौलादी हौसले दिखाने वाली सेना की ऐसी शारीरिक स्थिति देखकर बेगम मुमताज महल काफी चिंतित हो गईं।
सैनिकों की दिनचर्या बेहद कठिन होती थी और उन्हें युद्ध लड़ने तथा भारी हथियारों को संभालने के लिए भरपूर ऊर्जा और तुरंत मिलने वाले संतुलित पोषण की दरकार थी। मुमताज महल ने महसूस किया कि केवल सादा भोजन या रूखा-सूखा राशन सैनिकों के शरीर में आवश्यक ताकत बनाए रखने के लिए नाकाफी था।
शाही बावर्ची को मिला विशेष पकवान बनाने का फरमान
सैनिकों की बदहाल सेहत को सुधारने के लिए मुमताज महल ने अपने शाही बावर्ची (खानसामा) को तलब किया। उन्होंने बावर्ची को एक ऐसा संपूर्ण, संतुलित और पौष्टिक व्यंजन तैयार करने का सख्त निर्देश दिया जिसमें अनाज (चावल) के साथ प्रोटीन (गोश्त) का सही अनुपात हो। उनका मकसद एक ऐसा ‘वन-पॉट मील’ (एक ही बर्तन में पकने वाला संपूर्ण भोजन) तैयार करना था, जिसे बड़े पैमाने पर छावनियों में बनाना आसान हो, जो लंबे समय तक सैनिकों को ऊर्जा दे सके और जिसमें कार्बोहाइड्रेट, फैट, प्रोटीन और मसालों का ऐसा संतुलन हो जो पाचन में भी हल्का रहे।
बेगम मुमताज महल के एक फैसले ने बदल दी भारतीय खान-पान की दुनिया
शाही बावर्ची ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उसने चावल को घी में हल्का भूना, उसमें खड़े मसाले, जड़ी-बूटियां और उम्दा किस्म का गोश्त मिलाया और इसे हांडी के मुंह को आटे से सील कर धीमी आंच (दम पुख्त शैली) पर पकाया। जब हांडी की सील टूटी, तो न केवल उसकी खुशबू से पूरी छावनी महक उठी, बल्कि सैनिकों को एक ऐसा भोजन मिला जिसने उनकी खोई हुई ताकत लौटा दी। इस तरह छावनी के उस रसोईघर से उस अद्भुत व्यंजन का जन्म हुआ, जिसे आज पूरी दुनिया बिरयानी के नाम से जानती है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि बेगम मुमताज महल के एक फैसले ने भारतीय खान-पान की दुनिया ही बदल दी।
फारसी शब्द ‘बिरियान’ से हुई है नाम की उत्पत्ति
बिरयानी शब्द की जड़ें फारसी भाषा में गहराई से जुड़ी हुई हैं। भाषाविदों और पाक-इतिहासकारों के अनुसार, बिरयानी शब्द की उत्पत्ति फारसी भाषा के मूल शब्द ‘बिरियान’ (Birian) से हुई है। फारसी में ‘बिरियान’ का शाब्दिक अर्थ होता है-“पकाने से पहले तलना या भूनना”।
प्राचीन विधि के तहत, चावल को पानी में सीधे उबालने के बजाय पहले शुद्ध घी या तेल में धीमी आंच पर भुना जाता था, ताकि चावल का दाना खिला-खिला रहे, टूटे नहीं और मसालों का स्वाद चावल के भीतर तक समा सके। इसके बाद भुने हुए चावल को तले हुए मांस और सुगंधित केसर, इलायची, लौंग व दालचीनी के साथ परतों में सजाकर पकाया जाता था। इसी विशेष पाक प्रक्रिया के कारण इसे ‘बिरयानी’ नाम दिया गया।
सैनिकों की खुराक से लेकर वैश्विक पहचान तक
मुगल काल में छावनियों से शुरू हुआ यह नुस्खा धीरे-धीरे मुग़ल दरबार के शाही दस्तरख्वान की शान बन गया। समय बीतने के साथ यह हिंदुस्तान के अलग-अलग कोनों में फैला और वहां की स्थानीय संस्कृति में रच-बस गया। जब यह व्यंजन लखनऊ पहुंचा तो नवाबों की नफासत के साथ ‘अवधी बिरयानी’ बना, दक्षिण में पहुंचा तो निजामों की रसोई में इसने तीखे और चटपटे मसालों के साथ विश्व प्रसिद्ध ‘हैदराबादी दम बिरयानी’ का रूप ले लिया और बंगाल पहुंचकर आलू के मेल के साथ ‘कोलकाता बिरयानी’ कहलाया।
लेकिन इन तमाम स्वादों और शैलियों के पीछे वही ऐतिहासिक फलसफा जिंदा है, जो कभी मुमताज महल ने सैनिकों की सेहत सुधारने के लिए शुरू किया था। आज भले ही बिरयानी लजीज दावतों और त्योहारों का पर्याय बन चुकी हो, लेकिन इसका इतिहास हमें बताता है कि कैसे एक महारानी की मानवीय संवेदनशीलता और शाही खानसामे के हुनर ने मिलकर एक ऐसा लाजवाब व्यंजन रचा, जो सदियों बाद भी दुनिया भर के भोजन प्रेमियों के दिलों पर राज कर रहा है।

जब मुमताज महल पहुंचीं सैनिकों की छावनी
बेगम मुमताज महल के एक फैसले ने बदल दी भारतीय खान-पान की दुनिया
सैनिकों की खुराक से लेकर वैश्विक पहचान तक


