New Delhi: देश के कई मेडिकल कॉलेजों में शोध कार्य की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर जैसे पदों पर पदोन्नति के लिए आवश्यक शोध पत्र (रिसर्च पेपर) 35 हजार से 50 हजार रुपये तक में तैयार कराए जा रहे हैं। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित कराने के लिए अलग से शुल्क लिया जाता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
रिसर्च तैयार करने का पूरा पैकेज देने के आरोप
जानकारों के अनुसार, कुछ एजेंसियां और कथित रिसर्च कंसल्टेंसी शोध विषय तय करने, डेटा तैयार करने, सांख्यिकीय विश्लेषण करने, पूरा शोध पत्र लिखने और उसे जर्नल में प्रकाशित कराने तक की सेवाएं पैकेज के रूप में उपलब्ध करा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे वास्तविक शोध करने वाले शिक्षकों और शोधार्थियों को नुकसान पहुंच रहा है।
पदोन्नति की प्रक्रिया पर उठे सवाल
विशेषज्ञों के मुताबिक मेडिकल शिक्षा में पदोन्नति और शैक्षणिक मूल्यांकन के लिए प्रकाशित शोध पत्रों को महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। आरोप है कि इसी व्यवस्था का लाभ उठाकर कुछ लोग कम समय में अधिक शोध पत्र प्रकाशित दिखाकर तेजी से प्रोफेसर बनने की कोशिश करते हैं। उनका कहना है कि इससे चिकित्सा अनुसंधान की गुणवत्ता और विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
पारदर्शी जांच और डिजिटल सत्यापन की मांग
शिक्षा जगत से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि फर्जी या खरीदे गए शोध पत्रों के आधार पर नियुक्तियां और पदोन्नतियां होती रहीं तो इसका असर मेडिकल शिक्षा, उपचार प्रणाली और वैज्ञानिक अनुसंधान पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने शोध पत्रों की स्वतंत्र जांच, जर्नलों में प्रकाशित शोध की गुणवत्ता की कड़ी समीक्षा तथा अनियमितता मिलने पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही पारदर्शी मूल्यांकन और डिजिटल सत्यापन व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।





