रांची: झारखंड की राजधानी रांची के पिठौरिया थाना क्षेत्र अंतर्गत डहुटोली में आदिवासी अधिकारों के लिए निरंतर संघर्षरत रहने वाली युवा नेत्री निशा भगत की दर्दनाक आत्महत्या ने पूरे राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। जीवन के अंतिम क्षणों में फेसबुक लाइव पर आकर रो-रोकर सिस्टम की बेरुखी बयां करना और उसके बाद जान दे देना कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लचर रवैये की पोल खोलने वाला गंभीर प्रसंग बन चुका है। इस हृदयविदारक घटना के बाद मुख्य रूप से पिठौरिया थाना प्रभारी सतीश कुमार पांडेय की कार्यशैली और प्रशासनिक शिथिलता को लेकर चौतरफा आक्रोश देखा जा रहा है। मृतका के परिजनों, स्थानीय ग्रामीणों तथा विपक्ष के प्रमुख नेताओं ने सीधे तौर पर थानेदार की लापरवाही और संवेदनहीनता को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित करने और उन पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
शिकायतों पर नहीं हुआ संज्ञान, बेबसी में उठाया खौफनाक कदम
मूल रूप से गुमला की रहने वाली और रांची के पिठौरिया क्षेत्र में रहकर समाज के दबे-कुचले वर्गों की आवाज उठाने वाली निशा भगत पिछले कुछ समय से गंभीर मानसिक तनाव और प्रताड़ना के दौर से गुजर रही थीं। उनके परिजनों और नजदीकी लोगों का आरोप है कि उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं और उन्हें बदनाम करने की साजिशें रची जा रही थीं। इस बाबत जब स्थानीय पिठौरिया थाना को सूचित किया गया और सुरक्षा तथा कानूनी कार्रवाई की गुहार लगाई गई, तो कथित तौर पर थाना प्रभारी सतीश कुमार पांडेय ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।
परिजनों का कहना है कि यदि पहली ही शिकायत पर त्वरित जांच कर आरोपियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए होते, तो शायद एक होनहार और जुझारू बेटी को यूं असमय अपनी जान न गंवानी पड़ती। आत्महत्या से ठीक पहले फेसबुक लाइव पर निशा का बिलखना और यह कहना कि सिस्टम उनकी सुनवाई नहीं कर रहा, यह साबित करने के लिए काफी है कि उन्होंने खुद को किस कदर लाचार और असुरक्षित महसूस किया था।
विपक्ष का तीखा हमला, नेता प्रतिपक्ष ने खड़े किए तीखे सवाल
निशा भगत की मौत की खबर फैलते ही राज्य में सियासी पारा चढ़ गया है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, छात्र व युवा नेता देवेंद्र नाथ महतो, भैरव सिंह सहित विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक संगठनों ने घटना पर गहरा शोक जताते हुए पुलिस प्रशासन को सीधे कटघरे में खड़ा किया है।
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक महिला एक्टिविस्ट बार-बार अपनी जान पर खतरे की बात कहती रही, लेकिन स्थानीय पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। बाबूलाल मरांडी और अन्य नेताओं ने मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय व निष्पक्ष जांच कराई जाए, फेसबुक लाइव में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं उन पर कड़ी कार्रवाई हो और सबसे पहले कर्तव्य में घोर लापरवाही बरतने वाले पिठौरिया थाना प्रभारी को तत्काल निलंबित कर उनके विरुद्ध विभागीय व दंडात्मक प्रक्रिया शुरू की जाए।
ग्रामीणों का गुस्सा, बिना पैरवी और पैसे के नहीं होती सुनवाई
पिठौरिया थाना क्षेत्र के स्थानीय बाशिंदों का असंतोष भी अब खुलकर सामने आ रहा है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि थाना प्रभारी सतीश कुमार पांडेय के कार्यकाल में आम नागरिकों के लिए न्याय पाना लगभग असंभव हो गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, आम आदमी यदि किसी मारपीट, चोरी या प्रताड़ना की शिकायत लेकर थाने जाता है, तो उसकी प्राथमिकी तक दर्ज करने में हीला-हवाली की जाती है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में बिना राजनीतिक पैरवी या कथित ‘सुविधा शुल्क’ के आम फरियादियों की बात तक नहीं सुनी जाती। जनहित से जुड़े मुद्दों, अपराध नियंत्रण और पीड़ितों को सुरक्षा देने के बजाय पुलिस की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। लोगों का कहना है कि जब एक मुखर और पहचानी जाने वाली नेत्री की शिकायत पर समय रहते संज्ञान नहीं लिया गया, तो सुदूर देहात में रहने वाले निरीह ग्रामीणों और वंचित तबके की सुरक्षा का क्या हाल होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
भू-माफियाओं से साठगांठ और बढ़ते जमीन विवादों के आरोप
पिठौरिया, कांके और आसपास का इलाका राजधानी से सटा होने के कारण जमीन की कीमतों में भारी उछाल देख रहा है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि थाना प्रभारी सतीश पांडेय की कथित अनदेखी के कारण इलाके में भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। आए दिन जमीन पर अवैध कब्जे, घेराबंदी और खूनी संघर्ष की घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन पुलिस अक्सर मूकदर्शक बनी रहती है या फिर कथित तौर पर प्रभावशाली पक्ष को संरक्षण देने का काम करती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले कुछ महीनों में क्षेत्र में जमीन विवाद और अपराध दर में तेजी से इजाफा हुआ है। पीड़ितों द्वारा लिखित आवेदन दिए जाने के बावजूद भू-माफियाओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के बजाय मामलों को आपसी समझौते के नाम पर लटकाया जाता है या दबा दिया जाता है। इसी कथित मिलीभगत और संरक्षण के माहौल ने असामाजिक तत्वों को इतना निडर बना दिया कि वे सामाजिक कार्यकर्ताओं तक को खुलेआम धमकाने लगे।
पहले भी विवादों में रहा है कार्यकाल, प्रशासनिक अभिलेखों में सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब सतीश कुमार पांडेय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं। पुलिस विभाग और प्रशासनिक हलकों में भी उनकी कार्यशैली पूर्व में चर्चा का विषय रही है:
- विभागीय समीक्षा में फटकार और लाइन हाजिर: पूर्व में भी अपने पदस्थापन के दौरान वारंटियों की गिरफ्तारी में शिथिलता, पुराने कांडों के निष्पादन में लापरवाही और क्राइम मीटिंग्स में असंतोषजनक प्रदर्शन के चलते वरीय पुलिस पदाधिकारियों (एसएसपी/ग्रामीण एसपी) द्वारा उन्हें कई बार फटकार लगाई जा चुकी है और लाइन क्लोज जैसी कार्रवाइयां की जा चुकी हैं।
- पक्षपात और जन-आक्रोश: क्षेत्र में आपराधिक वारदातों के बाद समय पर उचित कार्रवाई न होने और मामलों के निपटारे में कथित पक्षपात को लेकर स्थानीय स्तर पर पूर्व में भी सड़क जाम और थाना घेराव जैसे विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं।
आदिवासी समाज में शोक की लहर, निष्पक्ष जांच की मांग
गुमला से लेकर रांची तक सामाजिक और आदिवासी संगठनों में निशा भगत के असमय चले जाने से गहरा मातम और आक्रोश है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां कहीं भी किसी गरीब, असहाय या आदिवासी परिवार पर जुल्म होता था, निशा भगत सबसे पहले मौके पर पहुंचती थीं और निडर होकर उनका हक दिलाती थीं। आज उसी जुझारू आवाज को प्रशासनिक बेरुखी और लचर व्यवस्था ने खामोश कर दिया।
समस्त सामाजिक संगठनों, विपक्ष और आम जनता ने एक सुर में मांग रखी है कि इस पूरे मामले को दबाने के बजाय इसकी तह तक जांच हो, पिठौरिया थाना प्रभारी सतीश पांडेय को तत्काल प्रभाव से पद से हटाकर निलंबित किया जाए और उनके पूरे कार्यकाल के दौरान जमीन विवादों व दर्ज शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य बेटी को सिस्टम की लाचारी का शिकार न होना पड़े।






