New Delhi: केंद्र सरकार ने ईंधन के मोर्चे पर एक बड़ा कदम उठाते हुए पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाले विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को घटाकर पूरी तरह शून्य कर दिया है। इसके साथ ही, घरेलू स्तर पर ईंधन की उपलब्धता और आपूर्ति को संतुलित बनाए रखने के उद्देश्य से डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) पर विशेष निर्यात शुल्क में क्रमशः 3 रुपए प्रति लीटर और 0.50 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि कर दी गई है। वित्त मंत्रालय द्वारा शनिवार को जारी आधिकारिक अधिसूचना में इन संशोधनों की जानकारी दी गई है।
नई संशोधित दरें और शुल्क बदलाव
वित्त मंत्रालय की नई अधिसूचना के मुताबिक, पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाला शुल्क अब घटकर शून्य हो गया है, जो इससे पहले 2.5 रुपए प्रति लीटर था। वहीं, डीजल के निर्यात पर शुल्क को 8.5 रुपए प्रति लीटर से बढ़ाकर 11.50 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया है। इसके अलावा, एटीएफ के निर्यात पर लगने वाले शुल्क को 10.50 रुपए प्रति लीटर से बढ़ाकर 11 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया है। सरकार द्वारा इन दरों की समीक्षा हर 15 दिन पर नियमित रूप से की जाती है।
कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा उछाल
मध्य पूर्व में चल रहे सैन्य संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित हुई है, जिसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है। इन हालातों को देखते हुए मार्च के अंत में सरकार द्वारा निर्यात शुल्क लागू किए गए थे। वर्तमान में बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का दाम बढ़कर 113.10 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। आंकड़ों के अनुसार, बीते एक हफ्ते में इसमें 1.55 प्रतिशत, एक महीने में 15.71 प्रतिशत और पिछले तीन महीनों में करीब 26 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
रणनीतिक मार्ग होर्मुज स्ट्रेट में बाधा
विशेषज्ञों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य ऐसे समय में घरेलू रिफाइनरों को विदेशी बाजारों की तुलना में स्थानीय खरीदारों को प्राथमिकता देने से रोकना है, जब वैश्विक स्तर पर कीमतें निर्यात के लिए अत्यधिक आकर्षक लाभ दे रही हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण ‘हॉर्मुज स्ट्रेट’ के बंद होने से स्थिति अधिक जटिल हो गई है। संघर्ष शुरू होने से पहले भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता था, जो फारस की खाड़ी को वैश्विक बाजारों से जोड़ता है। इस मार्ग पर व्यापारिक जहाजों के आवागमन में बाधा आने के कारण भारत को अब तेल आयात के लिए महंगे वैकल्पिक रास्तों की तलाश करनी पड़ रही है।







