रांची: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में अधिकारियों की कोई कमी नहीं रही, लेकिन कलम, समाज और जमीनी हकीकत को एक सूत्र में पिरोकर इतिहास रचने वाले व्यक्तित्व बिरले ही होते हैं। डॉ. कुमार सुरेश सिंह (1935–2006) एक ऐसा ही कालजयी नाम हैं, जिन्होंने लालफीताशाही की चौखट से बाहर निकलकर भारतीय मानवविज्ञान (Anthropology) और जनजातीय इतिहास को एक नई वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टि प्रदान की। वे न केवल एक संवेदनशील नौकरशाह थे, बल्कि एक ऐसे प्रखर इतिहासकार और मानवविज्ञानी भी थे, जिन्होंने इतिहास और मानवशास्त्र के सुंदर समन्वय से भारत की जनजातीय आत्मा को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
शिक्षा से सिविल सेवा और आदिवासियों से ‘पहली नज़र का प्रेम’
डॉ. कुमार सुरेश सिंह की शैक्षणिक पृष्ठभूमि बेहद शानदार रही। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में स्नातक और परास्नातक दोनों ही परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिसके लिए उन्हें श्रीमती राधिका सिन्हा स्वर्ण पदक तथा विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक से नवाजा गया। 1956 में उन्होंने प्रतिष्ठित इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स (ISM), धनबाद के मानविकी विभाग में व्याख्याता के रूप में अध्यापन शुरू किया। इसके उपरांत 1958 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए चुने गए और उन्होंने बिहार कैडर का चयन किया।
प्रशासनिक सेवा में उनकी पहली पदस्थापना 1959 में सिंहभूम जिले में सहायक बंदोबस्त पदाधिकारी (Assistant Settlement Officer) के रूप में हुई। यहीं उनका पहला साक्षात्कार ‘हो’ (Ho) जनजाति की सामाजिक संरचना और कृषि व्यवस्था से हुआ। उन्होंने केवल दफ्तर में बैठकर आदेश पारित नहीं किए, बल्कि ‘हो’ भाषा सीखी, 100 गांवों का गहन सर्वेक्षण किया और विलेज नोट्स तैयार किए।
इसके बाद जब वे खूंटी में अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) बने, जो मुख्य रूप से मुंडा बहुल इलाका था, तो उन्होंने मुंडारी भाषा सीखी और उनके पारंपरिक पर्व-त्योहारों में सक्रिय भागीदारी की। जनजातीय समाज के इस जीवंत संसार से उनका यह जुड़ाव किसी ‘पहली नज़र के प्रेम’ जैसा था, जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा ही बदल दी। यहीं रहते हुए उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से ‘छोटानागपुर में बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन (1874–1901)’ विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की।
बिरसा मुंडा को संसद के गलियारों तक पहुंचाया
डॉ. सिंह का सबसे युगांतरकारी योगदान भगवान बिरसा मुंडा और उनके ‘उलगुलान’ को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करना माना जाता है। 1966 में उनकी पुस्तक द डस्ट-स्टॉर्म एंड द हैंगिंग मिस्ट प्रकाशित हुई, जिसका संशोधित संस्करण 1983 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा बिरसा मुंडा एंड हिज मूवमेंट नाम से छपा। इस कृति ने बिरसा मुंडा के आंदोलन को केवल एक स्थानीय विद्रोह के बजाय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, नवजागरण और जल-जंगल-जमीन के स्वाभिमान से जुड़े राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में रेखांकित किया।
खूंटी के चलकद गांव के एक युवा की गाथा देश-दुनिया तक पहुंची और उसी का सुखद परिणाम था कि 28 अगस्त 1988 को संसद भवन परिसर में तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा का अनावरण किया गया। बिरसा मुंडा देश के पहले ऐसे जनजातीय नायक बने, जिन्हें राष्ट्रीय नेताओं की आकाशगंगा में यह सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ। इतना ही नहीं, सुप्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी ने स्वयं स्वीकार किया कि उनका कालजयी उपन्यास अरण्येर अधिकार डॉ. के. एस. सिंह की इसी शोध पुस्तक पर आधारित था, जिसने उनके जीवन और लेखन की दिशा को बदल दिया।
पलामू अकाल और अमर्त्य सेन की सराहना
1965 से 1968 के दौरान डॉ. सिंह पलामू के उपायुक्त (Deputy Commissioner) रहे। पलामू उस समय भीषण सूखे और भुखमरी के लिए जाना जाता था। उन्होंने 1967 के ऐतिहासिक अकाल के दौरान राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राहत तंत्र का कुशल नेतृत्व किया और बड़े पैमाने पर होने वाली भुखमरी को टाल दिया।
अकाल प्रबंधन के अपने जमीनी अनुभवों को उन्होंने 1975 में प्रकाशित पुस्तक द इंडियन फेमिन, 1967 में लिपिबद्ध किया। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन ने इस पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इसे ‘अकाल और राहत के सिद्धांत व व्यवहार का एक विवेकपूर्ण समन्वय’ बताया और कहा कि यह पुस्तक इस बात का आदर्श अध्ययन है कि कैसे एक संवेदनशील नौकरशाही बड़े पैमाने पर होने वाली मौतों को रोक सकती है।
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग (TRL) और झारखंड का वैचारिक आधार
फरवरी 1978 से जून 1980 तक वे दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त (Divisional Commissioner) रहे और 1980 में उन्होंने रांची विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति का पदभार भी संभाला। उन्होंने आदिवासियों के भाषाई और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए रांची विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग’ (TRL Department) की स्थापना की।
उन्होंने अमेरिका से डॉ. रामदयाल मुंडा को आमंत्रित कर इस विभाग का पहला विभागाध्यक्ष नियुक्त किया। डॉ. सिंह का मानना था कि अमेरिका के रेड इंडियंस की तरह यहां के आदिवासियों की पहचान न मिटे, इसलिए उनकी भाषा और अस्मिता को बचाना अनिवार्य है। आगे चलकर यही टीआरएल विभाग अलग झारखंड राज्य आंदोलन का प्रमुख बौद्धिक एवं वैचारिक केंद्र साबित हुआ।
‘पीपल ऑफ इंडिया’: 43 खंडों का विश्वविख्यात महापरियोजना
1984 से 1993 के दौरान डॉ. के. एस. सिंह भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (Anthropological Survey of India – ASI) के महानिदेशक रहे। इसी दौरान उन्होंने भोपाल में स्थित देश के पहले राष्ट्रीय मानव संग्रहालय (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय) के संस्थापक निदेशक के रूप में भी इसकी रूपरेखा तैयार की।
एकादमिक जगत में उनका सबसे कीर्तिमान कार्य ‘पीपल ऑफ इंडिया’ (People of India – POI) परियोजना की संकल्पना और उसका सफल संपादन रहा। इस अभूतपूर्व स्वदेशी परियोजना के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे:
- पूरे भारत के 438 जिलों, 4,513 गांवों और 941 शहरों से 4,694 मानव समुदायों की पहचान कर उनका सांस्कृतिक, जैविक और भाषाई दस्तावेज तैयार किया गया।
- इस विशाल अध्ययन में एएसआई और बाहरी संस्थानों के 470 से अधिक विद्वानों ने भाग लिया और लगभग 120 कार्यशालाएं आयोजित की गईं।
- इसमें 2,548 समुदायों की लगभग 21,362 तस्वीरें संकलित कर एक समृद्ध दृश्य दस्तावेजीकरण (Visual Documentation) रचा गया।
- राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के माध्यम से देश में पहली बार नृवंशविज्ञान (Ethnography) के आंकड़ों के विश्लेषण हेतु विशेष सॉफ्टवेयर विकसित किया गया।
- यह 43 खंडों में प्रकाशित दुनिया का सबसे बड़ा मानवशास्त्रीय अध्ययन बना, जिसके लिए इसे 1995 में ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में दर्ज किया गया।
शोध का विशाल संसार और मुंडारी परंपरा से अंतिम विदाई
डॉ. सिंह ने अपने जीवनकाल में लगभग 60 पुस्तकों का लेखन, संपादन व परिचय लिखा और 270 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए। उन्होंने रामायण और महाभारत की जनजातीय एवं लोक परंपराओं, जनजातीय रूढ़िगत कानूनों (Customary Laws) और आदिवासियों के आर्थिक रूपांतरण पर युगांतरकारी कार्य किया। बेल्जियम के जेसुइट पादरी फादर पी. पोनेट के आग्रह पर उन्होंने तीन दशक से अटके एनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका के 15वें और 16वें खंड की भूमिका लिखकर उनका प्रकाशन सुनिश्चित कराया। उनके योगदान के लिए उन्हें ‘बिरसा मुंडा पुरस्कार’ (1985), ‘जी. एस. घुर्ये पुरस्कार’ (1995) और कई अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया।
डॉ. के. एस. सिंह का जनजातीय माटी से जुड़ाव केवल किताबों तक सीमित नहीं था। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार मुंडारी रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाए और उनकी अस्थियों को खूंटी की तजना नदी में प्रवाहित किया जाए। खूंटी वही भूमि थी जो उनकी कर्मभूमि रही और जहां वे पहली बार बिरसा मुंडा के विचारों से एकाकार हुए थे। उनके देहावसान के बाद उनके परिजनों ने दिल्ली से खूंटी तक उनकी अंतिम यात्रा आयोजित की और तजना नदी के तट पर मुंडारी परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनकी पत्नी बिमलेश्वरी सिंह ने उनकी स्मृतियों को संजोते हुए उनके निजी पुस्तकालय की लगभग 4,000 दुर्लभ पुस्तकें जेवियर समाज सेवा संस्थान (XISS), रांची को दान कर दीं। डॉ. कुमार सुरेश सिंह आज भी एक संवेदनशील प्रशासक, लोक-अनुसंधायक और झारखंड के बौद्धिक जनक के रूप में सदैव याद किए जाते हैं।




