रांची: झारखंड राज्य निर्माण के ढाई दशक से अधिक का सफर तय हो चुका है। 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर जब नए राज्य का गठन हुआ, तब उम्मीद जगी थी कि यहां के हर वर्ग, समुदाय और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज को नीति निर्माण के केंद्र में जगह मिलेगी। लेकिन आज 26 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी राज्य का अल्पसंख्यक समुदाय अपने बुनियादी प्रशासनिक ढांचे और संवैधानिक हक के लिए संघर्ष कर रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि राज्य में अब तक न तो एक स्वतंत्र ‘अल्पसंख्यक निदेशालय’ (Minority Directorate) की स्थापना हो सकी है और न ही जनजातीय अनुसंधान संस्थान (TRI) की तर्ज पर ‘माइनॉरिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (MRI) का गठन किया गया है। नतीजतन, करोड़ों रुपये के बजट और दर्जनों लोकलुभावन योजनाओं के कागजी दावों के बावजूद अल्पसंख्यकों से जुड़ी नीतियां सही ढंग से जमीन पर नहीं उतर पा रही हैं।
आबादी बड़ी, लेकिन बुनियादी प्रशासनिक तंत्र नदारद
आंकड़ों पर गौर करें तो झारखंड की सामाजिक संरचना में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य में लगभग 17 प्रतिशत धार्मिक अल्पसंख्यक और करीब 19 प्रतिशत भाषाई अल्पसंख्यक निवास करते हैं। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद राज्य में अल्पसंख्यकों के लिए कोई एकीकृत, सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र नहीं है। वर्तमान में जो विभाग या प्रकोष्ठ इन योजनाओं को देख रहा है, वह खुद अधिकारियों और कर्मचारियों के भारी अभाव से जूझ रहा है। एक-एक अधिकारी पर कई विभागों का अतिरिक्त प्रभार है, जिसके कारण योजनाओं की मॉनिटरिंग, बजट आवंटन और लाभुकों के सत्यापन का काम लगातार पिछड़ता जा रहा है।
निदेशालय और MRI के होने से क्या बदलाव आता?
प्रशासनिक विशेषज्ञों और समाज के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि यदि राज्य में अल्पसंख्यक निदेशालय की स्थापना होती, तो योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद पारदर्शी और सुगम हो जाता:
- एक ही छत के नीचे संपूर्ण व्यवस्था: निदेशालय बनने से अल्पसंख्यकों के कल्याण से जुड़े सभी प्रमुख कार्यालय, अनुभाग और नोडल अधिकारी एक ही छत के नीचे मौजूद होते, जिससे आम नागरिकों को दफ्तर-दर-दफ्तर भटकना नहीं पड़ता।
- जिला स्तर पर स्वतंत्र अधिकारी: इसके तहत प्रत्येक जिले में एक स्वतंत्र जिला अल्पसंख्यक कल्याण पदाधिकारी (DMO) की नियमित तैनाती होती। वर्तमान में अन्य विभागों के अधिकारियों को इसका प्रभार दे दिया जाता है, जिससे स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समय पर निस्तारण नहीं हो पाता।
- शोध आधारित ठोस नीतियां: जिस प्रकार टीआरआई (TRI) जनजातीय समाज की संस्कृति, भाषा, आजीविका और समस्याओं पर वैज्ञानिक अध्ययन करता है, ठीक उसी तर्ज पर एमआरआई (MRI) के गठन से अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन, शिक्षा, कौशल विकास और आर्थिक स्थिति पर प्रामाणिक शोध संभव हो पाता। जब तक जमीनी आंकड़े और शोध रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक प्रभावी योजनाएं बनाना लगभग असंभव है।
पड़ोसी राज्यों से भी सीख नहीं ले पाया झारखंड
प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि झारखंड के पड़ोसी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में दशकों पहले से अलग अल्पसंख्यक कल्याण निदेशालय, शोध इकाइयां और सुदृढ़ जिला स्तरीय ढांचा सफलतापूर्वक काम कर रहा है। वहां बाकायदा शोध रिपोर्टों के आधार पर छात्रवृत्ति, स्वरोजगार, वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन और अल्पसंख्यक बहुल इलाकों के लिए बुनियादी विकास योजनाएं बनाई जाती हैं। इसके विपरीत झारखंड में आज भी यह पूरा क्षेत्र तदर्थ (ad-hoc) व्यवस्था के सहारे चल रहा है।
सरकार का रुझान नहीं या सरकारी उदासीनता
इस गंभीर प्रशासनिक गतिरोध पर झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग भी वर्षों से मौन है। आयोग के निवर्तमान सदस्य, उपाध्यक्ष और अध्यक्ष भी इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर सके। खामोशी से उन्होंने अपने तीन वर्षीय कार्यकाल को पूरा किया और सरकारी सुख-सुविधा का उपभोग कर चलते बने। विशेषज्ञ बताते हैं कि स्वतंत्र निदेशालय और एमआरआई का गठन केवल फाइलों का विस्तार नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों के समग्र सशक्तीकरण का मुख्य आधार है। झारखंड के 26 वर्ष पूरे होने के बाद अब यह सवाल केवल फाइलों में अटका प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि राज्य की 36 प्रतिशत से अधिक धार्मिक व भाषाई आबादी के अधिकारों, शिक्षा, रोजगार और गरिमा से जुड़ा एक गंभीर लोकतांत्रिक प्रश्न बन चुका है।




