रांची: मई 1799 का वह ऐतिहासिक दिन भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक और नाटकीय पन्नों में गिना जाता है। श्रीरंगपट्टनम के दुर्ग में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान जब अपनी अंतिम सांसें गिन रहे थे, तब उनके साथ जो कुछ हुआ वह किसी भी आम जंग से बिल्कुल अलग था। सुल्तान की शहादत सीधे तौर पर युद्धक्षेत्र में लूटपाट की कोशिश से जुड़ी थी। जंग के अंतिम पलों में एक यूरोपीय सैनिक ने टीपू की उस सुनहरी पेटी को जबरन छीनने की कोशिश की, जिससे उनकी तलवार बंधी हुई थी। घायल होने के बावजूद टीपू ने झुकने से इनकार कर दिया और उस सैनिक पर पलटवार किया। इसी छीना-झपटी के बीच घबराए ब्रिटिश सैनिकों ने उनके सिर में गोली दाग दी और ‘मैसूर का शेर’ रणभूमि में हमेशा के लिए खामोश हो गया।
ब्रिटिश इतिहास और औपनिवेशिक दस्तावेजों में टीपू सुल्तान को अकसर एक खलनायक, क्रूर शासक और कट्टर विरोधी के रूप में पेश किया गया। मशहूर किताब टीपूज टाइगर्स में भी औपनिवेशिक नजरिए से उनकी छवि को आक्रामक बताया गया, लेकिन यही किताब सुल्तान के एक बेहद संवेदनशील और कलात्मक पहलू से भी पर्दा उठाती है। लंदन के प्रसिद्ध विक्टोरिया एंड अल्बर्ट संग्रहालय के एशियाई विभाग की वरिष्ठ क्यूरेटर सूजन स्ट्रॉन्ज के अनुसार, टीपू केवल एक योद्धा नहीं थे, बल्कि उन्हें हर खूबसूरत चीज से गहरा लगाव था। वे वास्तुकला, हरे-भरे बगीचों, दुर्लभ नगीनों, नक्काशीदार आभूषणों और नायाब कलाकृतियों के सच्चे कद्रदान थे।
अंग्रेजों ने टीपू की छवि को धूमिल करने के लिए उनके प्रसिद्ध यांत्रिक खिलौना-बाघ (मैकेनिकल टाइगर) का सहारा लिया, जिसमें एक बाघ को यूरोपीय सैनिक पर हमला करते दिखाया गया था। ब्रिटिश साहित्य और जॉन कीट्स जैसे कवियों ने इसे दरिंदगी का प्रतीक बताया, जबकि सच्चाई यह थी कि टीपू अपने स्वाभिमान और संप्रभुता के लिए लड़ रहे थे।
टीपू और उनके पिता हैदर अली का उदय मुगल साम्राज्य के ढलान और मराठों के प्रभुत्व के दौर में हुआ था। उनकी रियासत में हिंदू आबादी बहुसंख्यक थी। टीपू ने फारसी और स्थानीय हिंदवी परंपराओं का सुंदर संगम तैयार किया। उनके राज्य के सिक्कों पर उनका अपना नाम नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में शक्ति और शुभता के प्रतीक ‘हाथी’ की आकृति खुदी होती थी।
ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट स्केली के संस्मरण बताते हैं कि टीपू की राजधानी घने जंगलों, सुरम्य घाटियों और बेहद सुनियोजित गांवों से सजी थी। बेंगलुरु स्थित उनके महल में बेशकीमती कालीन, सोने-चांदी के तारों से बुने रेशमी वस्त्र और शीशों से तराशे गए शानदार कक्ष मौजूद थे।
1792 की संधि में अंग्रेजों ने टीपू से उनका आधा राज्य छीन लिया था और उनके दो मासूम बेटों को बंधक बना लिया था। टीपू ने संघर्ष कर अपने बच्चों को वापस तो हासिल किया, लेकिन 1799 में उनके पतन के साथ ही मैसूर का स्वर्णिम युग समाप्त हो गया। टीपू की शहादत के तुरंत बाद ब्रिटिश सेना ने पूरे महल और तोपखाने में भीषण लूटपाट मचाई। होर्मुज और मस्कट से लाए गए अनमोल मोती, हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी की मोहरें, बेशकीमती पुस्तकालय और शाही पांडुलिपियां लूट ली गईं। आज जब वैश्विक स्तर पर टीपू की निशानियों की नीलामी होती है, तो यह केवल किसी राजा की संपत्ति नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के समृद्ध और स्वाभिमानी इतिहास की गवाही देती है।





