Ranchi: भारतीय राजनीतिक इतिहास में ऐसे विरले ही नेता हुए हैं जिन्होंने सत्ता के सर्वोच्च शिखर को ठुकराकर जनता के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष का मार्ग चुना। 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताबदियारा में जन्मे जयप्रकाश नारायण, जिन्हें देश अत्यंत आदर और स्नेह से ‘जेपी’ और ‘लोकनायक’ कहता है, एक ऐसे ही अद्वितीय युगपुरुष थे। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी या राजनेता नहीं थे, बल्कि वे स्वतंत्र भारत की अंतरात्मा और जनचेतना के जीवंत प्रतीक थे। जब भी देश में लोकतंत्र की सांसें घुटने लगीं, जेपी ने एक मसीहा की तरह सामने आकर सत्ता की मनमानी को ललकारा और जनशक्ति की विजय सुनिश्चित की।
सादगी, शिक्षा और आजादी की जंग
जेपी का प्रारंभिक जीवन सादगी और गहन अध्ययन से ओत-प्रोत था। उच्च शिक्षा के लिए वे अमेरिका गए, जहां उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए खेतों और कारखानों में मजदूरी तक की। इस संघर्षपूर्ण दौर में उन्होंने मार्क्सवादी विचारों का गहन अध्ययन किया, जिसने उनके मन में समाज के दबे-कुचले तबके के प्रति गहरी संवेदना भर दी।
भारत लौटने के बाद वे महात्मा गांधी के विचारों से गहरे प्रभावित हुए और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। 1942 के ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जेपी की भूमिका एक जननायक के रूप में उभरी। हजारीबाग जेल की दीवार फांदकर उनका फरार होना और भूमिगत रहकर ‘आजाद दस्ता’ का गठन कर अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला देना, आज भी भारतीय शौर्य की अमर गाथाओं में दर्ज है। वे ऐसे नायक थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूरतम यातनाओं के सामने भी कभी सिर नहीं झुकाया।
सत्ता का त्याग और भूदान आंदोलन: साध्य और साधन की पवित्रता
आजादी के बाद जब राजनीतिक दल सत्ता की मलाई और कुर्सियों की होड़ में लगे थे, तब जेपी चाहते तो देश के शीर्षतम पदों पर आसीन हो सकते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं उन्हें अपनी सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका सौंपना चाहते थे, लेकिन जेपी का लक्ष्य पद नहीं, बल्कि आम जनमानस का कल्याण था।
उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बनाकर आचार्य विनोबा भावे के ‘भूदान आंदोलन’ और ‘सर्वोदय’ के साथ जुड़ने का निर्णय लिया। वे गांव-गांव, पांव-पांव घूमे और जमींदारों को अपनी जमीनें भूमिहीन किसानों में बांटने के लिए प्रेरित किया। इतना ही नहीं, चंबल के दुर्दांत डाकुओं का हृदय परिवर्तन कर उन्हें मुख्यधारा में लौटाना जेपी के नैतिक बल का ऐसा उदाहरण था, जिसने पूरी दुनिया को चकित कर दिया था।
संपूर्ण क्रांति: जब छात्रों के आह्वान पर हिल गया तख्त-ओ-ताज
1970 का दशक आते-आते स्वतंत्र भारत भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और प्रशासनिक तानाशाही के दलदल में धंसने लगा था। गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन के बाद बिहार के छात्रों ने जेपी से नेतृत्व संभालने की गुहार लगाई। उम्र के ढलान और खराब स्वास्थ्य के बावजूद, जेपी ने छात्रों के आग्रह को स्वीकार किया परंतु इस शर्त पर कि आंदोलन पूर्णतः अहिंसक होगा।
5 जून 1974 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में लाखों की उमड़ी भीड़ के सामने जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ (Total Revolution) का बिगुल फूंका। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कालजयी पंक्तियां गूंज उठीं—
“सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!”
जेपी का संपूर्ण क्रांति का दर्शन केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं था; यह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आत्मिक इन सातों क्षेत्रों में बुनियादी आमूलचूल परिवर्तन का आह्वान था।
आपातकाल और लोकतंत्र का पुनर्जन्म
1975 में जब देश में आपातकाल (इमरजेंसी) थोपा गया, तो जेपी को सबसे पहले गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। जेल की दीवारों में उनका स्वास्थ्य बेहद बिगड़ गया और उनकी दोनों किडनियां खराब हो गईं, लेकिन उनके अडिग हौसले को कोई तानाशाही नहीं तोड़ सकी।
1977 में जब आम चुनाव हुए, तो डायलिसिस के सहारे जीवित इस वृद्ध योद्धा ने बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट कर ‘जनता पार्टी’ के झंडे तले ला खड़ा किया। पहली बार स्वतंत्र भारत में किसी गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। जेपी ने एक बार फिर साबित किया कि सत्ताधारी चाहे जितने शक्तिशाली हों, जनता की संगठित इच्छाशक्ति से बड़ा कोई नहीं होता। चुनाव जीतने के बाद भी जेपी ने कोई पद नहीं लिया; वे बस राष्ट्र के मार्गदर्शक बने रहे।
वर्तमान दौर में जेपी के विचारों की प्रासंगिकता
8 अक्टूबर 1979 को पटना में लोकनायक ने अंतिम सांस ली। वर्ष 1999 में उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया।
आज जब राजनीति सिद्धांतों से भटककर केवल सत्ता पाने और बनाए रखने का साधन बनती दिखती है, तब जेपी का जीवन हमें याद दिलाता है कि राजनीति का अंतिम उद्देश्य लोक-सेवा और नैतिकता है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण का विचार हमें सिखाता है कि सजग नागरिक ही एक जीवंत लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उनका जीवन हर उस नागरिक के लिए प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है जो अन्याय, असमानता और निरंकुशता के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस रखता है।

सादगी, शिक्षा और आजादी की जंग
सत्ता का त्याग और भूदान आंदोलन: साध्य और साधन की पवित्रता
संपूर्ण क्रांति: जब छात्रों के आह्वान पर हिल गया तख्त-ओ-ताज
आपातकाल और लोकतंत्र का पुनर्जन्म


