Patna: सोशल मीडिया और स्मार्टफोन की क्रांति ने पूरी दुनिया को हमारी हथेली पर लाकर खड़ा कर दिया है। कहीं कोई घटना घटती है और पलक झपकते ही उसकी तस्वीर या वीडियो लाखों-करोड़ों स्क्रीन तक पहुंच जाता है। लेकिन बिहार के जमुई में घटी हालिया घटना ने इस तकनीकी ताकत के उस स्याह पहलू को उजागर किया है, जो हमारे सामाजिक चरित्र और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। सवाल यह उठने लगा है कि क्या सोशल मीडिया से जुड़ते-जुड़ते हम एक संवेदनशील समाज के तौर पर एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं?
वीडियो बनाना आसान, मदद करना मुश्किल
बीते 19 सितंबर को जमुई में दो नाबालिग छात्र-छात्राओं के साथ बदसलूकी की शर्मनाक घटना सामने आई। अपराधियों ने न केवल दुर्व्यवहार किया, बल्कि उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए एसआईटी (SIT) बनाई, पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें से दो को हाफ एनकाउंटर के बाद दबोचा गया। लेकिन चिंताजनक बात यह रही कि आम यूजर्स ने भी उस वीडियो को धड़ल्ले से शेयर करना शुरू कर दिया। बिहार पुलिस को पीड़ित बच्चों की पहचान उजागर करने वाले करीब 120 सोशल मीडिया प्रोफाइल को चिह्नित करना पड़ा। जिस तकनीक से अपराध के खिलाफ न्याय की गुहार लगनी चाहिए थी, उसी तकनीक ने पीड़ित की निजता और भविष्य को संकट में धकेल दिया।
व्यूज की भूख में खत्म होती संवेदना
इंटरनेट पर लाइक, शेयर, कमेंट और व्यूज जुटाने की अंधी दौड़ में लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि कैमरे के सामने कोई ‘कंटेंट’ नहीं, बल्कि जीती-जागती जिंदगी होती है। किसी पीड़ित की बेबसी को वायरल सेंसेशन बना देना सभ्य समाज की निशानी नहीं हो सकती। कई लोग यह सोचकर वीडियो आगे बढ़ाते हैं कि वे आवाज उठा रहे हैं, लेकिन हकीकत में वे पीड़िता के चेहरे और अस्मिता को सार्वजनिक कर उसे जीवनभर का मानसिक संताप दे रहे होते हैं। सोशल मीडिया कोई कानून की अदालत नहीं है; किसी घटना की सूचना देने और भीड़ बनकर फैसला सुनाने में बुनियादी फर्क होता है।
3 सेकंड रुकें और सोचें
एक जिम्मेदार डिजिटल नागरिक के रूप में हमें अपनी उंगलियों पर संयम रखना होगा। अगली बार जब भी कोई संवेदनशील वीडियो स्क्रीन पर आए, तो शेयर करने से पहले महज 3 सेकंड रुकें और सोचें—क्या यह किसी की मदद करेगा या किसी की जिंदगी को गर्त में धकेलेगा? यदि कहीं कोई अपराध घटित हो रहा है, तो पहला काम वीडियो बनाना नहीं, बल्कि मदद के लिए हाथ बढ़ाना या पुलिस को सूचना देना होना चाहिए। वीडियो को सनसनी बनाने के बजाय साक्ष्य के तौर पर कानूनी एजेंसियों को सौंपें। तकनीक कभी बुरी नहीं होती, लेकिन जब हाथ में स्मार्टफोन और दिल में संवेदनहीनता हो, तब समाज का पतन शुरू होता है।
–संतोष कुमार तिवारी, स्वतंत्र पत्रकार




