Riyadh, Saudi Arabia: यमन में सऊदी अरब समर्थित सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच जारी संघर्ष ने अब बेहद गंभीर मोड़ ले लिया है। हूतियों ने रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। लाल सागर के तटीय क्षेत्रों में मिली बढ़त और अहम द्वीपों पर नियंत्रण के बाद सऊदी अरब के लिए यमन में परिस्थितियां काफी जटिल हो चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने सऊदी समर्थित यमनी सुरक्षा बलों की कमजोरियों और खुफिया तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है।
1 लाख लड़ाके और खुफिया तंत्र की भारी चूक
रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी समर्थित गठबंधन हूतियों की लंबे समय से चल रही गुप्त सैन्य तैयारियों का सही आकलन करने में नाकाम रहा। विद्रोही गुट जमीन पर चुपचाप अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार करता रहा। एक पश्चिमी राजनयिक ने दावा किया है कि हूतियों ने करीब एक लाख लड़ाकों की एक विशाल फौज तैयार कर ली है। अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंक चैथम हाउस के विश्लेषक इसे सऊदी अरब की सबसे बड़ी खुफिया विफलता करार दे रहे हैं। रणनीतिकारों का कहना है कि सऊदी अरब इस समय यमन के मोर्चे पर खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहा है।
अमेरिकी हथियारों पर कब्जा और सरकारी बलों का पीछे हटना
हूती विद्रोहियों की तेज आक्रामक बढ़त के सामने यमनी सरकारी बल प्रभावी प्रतिरोध दर्ज कराने में असमर्थ रहे। सेना के पीछे हटने के चलते भारी मात्रा में अमेरिकी और सऊदी मूल के आधुनिक हथियार हूतियों के हाथ लग गए हैं। इससे न केवल विद्रोहियों के शस्त्रागार में इजाफा हुआ है, बल्कि उन्हें विरोधी खेमे की तकनीकी क्षमताओं की गोपनीय जानकारी भी मिल गई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित हवाई हमलों और हूतियों की वास्तविक क्षमता को कम आंकने की रणनीतिक भूल ने विद्रोहियों को फ्रंट फुट पर ला खड़ा किया है।
कूटनीतिक मदद की तलाश, अमेरिका-यूरोप की बेरुखी
जमीन पर बढ़ते दबाव के बीच सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से संपर्क कर सैन्य सहयोग पर चर्चा की है। रियाद चाहता है कि लाल सागर में सुरक्षा के लिए मिस्र सक्रिय भूमिका निभाए, हालांकि मिस्र की तरफ से अभी तक किसी प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी की पुष्टि नहीं हुई है। दूसरी ओर, अमेरिका ने भी सीधी मदद को लेकर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है और यूरोपीय देशों ने भी जवाबी सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल होने से दूरी बना ली है।
बाब-अल-मंदेब पर हूतियों का बढ़ता प्रभाव अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए बड़ा खतरा बन गया है, जिससे होर्मुज के बाद इस प्रमुख जलमार्ग पर भी ईरान समर्थित गुटों का दबदबा बढ़ने की आशंका है।




