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रांची। महाजनी जुल्म और शोषण के खिलाफ हुए आंदोलन के महानायक मजरुल हसन खान। एक बड़े जमींदार परिवार से होते हुए भी जिन्होंने सभी सुख-सुविधा को त्याग दिया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा थाम कर महाजनों द्वारा किए जा रहे शोषण एवं जुल्म के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी। दिशोम गुरु शिबू सोरेन को जिन्होंने पार्टी में लाया और महाजनी जुल्म और शोषण के खिलाफ एकजूट होकर लड़े। ऐसे महानायक मजरुल हसन खान का 53वां शहादत दिवस 18 मार्च 2025 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी झारखंड राज्य परिषद द्वारा अल्बर्ट एक्का चौक में मनाया गया। इस अवसर पर उनके चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। गौरतलब हो कि कामरेड खान को किसानों एवं मजदूरों से काफी लगाव था और वे उनकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। यही वजह है कि बाद में उन्होंने चुनाव लड़ना स्वीकार किया। पहली बार वह रामगढ़ विधानसभा की सामान्य सीट पर 1969 को चुनाव लड़े लेेकिन इंडियन नेशनल कांग्रेस के बाबूलाल अग्रवाल से महज 625 मतों के अंंतर से हार गए। वहीं, 1972 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें जरीडीह विधानसभा एवं रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया। इस समय वह हजारीबाग जेल में बंद थे और जेल में रहकर ही उन्होंने यह चुनाव लड़ा। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जरीडीह विधानसभा क्षेत्र से वह बीजेएस के छत्रु राम महतो से महज 206 मतों के अंतर से हार गए। वहीं, रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र से उन्हें प्रचंड जीत मिली। इस चुनाव में उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी काे कुल 3370 मतों के अंतर से हराया और अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज की। लेकिन अफसोस की बात है कि शपथ लेने से पूर्व ही पटना विधायक आवास के फ्लैट न 302 में उनकी हत्या कर दी गई। यह देश की पहली राजनीतिक हत्या थी। इसका संपूर्ण एवं विस्तृत वर्णन डॉ मुजफ्फर हुसैन ने अपनी पुस्तक झारखंड की मुस्लिम विभूतियां में की हैै।

