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Lifestyle Desk: गुस्सा आना एक सामान्य मानवीय प्रक्रिया है, लेकिन अधिकांश मामलों में गुस्सा कोई अकेली या स्वतंत्र भावना नहीं होता है। हालिया मनोवैज्ञानिक अध्ययनों और विशेषज्ञों के विचारों के मुताबिक, गुस्सा होता है भीतर छिपी कई गहरी भावनाओं का बाहरी रूप जो इंसान के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को बयां करता है। विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से मानना है कि किसी व्यक्ति में लगातार दिखाई देने वाला गुस्सा अक्सर उसकी आंतरिक मानसिक थकान, अकेलेपन, उपेक्षा और अत्यधिक भावनात्मक दबाव का एक बड़ा संकेत हो सकता है, जिसे लोग समझ नहीं पाते हैं।
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दुनिया के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक पॉल एकमैन के सिद्धांतों के अनुसार, गुस्सा कई बार सीधे तौर पर सामने नहीं आता। यह असल में इंसान के भीतर मौजूद गहरे दुख, डर, घोर निराशा और असुरक्षा जैसी अत्यंत संवेदनशील भावनाओं को समाज या परिवार से छिपाने का एक आसान माध्यम बन जाता है। पारिवारिक या सामाजिक रिश्तों में जब भी किसी व्यक्ति को लगातार यह महसूस होने लगता है कि उसकी बात को सुना नहीं जा रहा, उसे अपनों से पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा या फिर उसकी भावनाओं को अहमियत नहीं दी जा रही, तो यह अंदरूनी पीड़ा धीरे-धीरे सुलगती रहती है और अंत में गुस्से के रूप में बाहर आती है। कई बार लोग अपनी कमजोरी या लाचारी को सीधे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, ऐसे में गुस्सा ही उनकी दबी हुई भावनाओं को बाहर निकालने का सबसे सुलभ रास्ता बन जाता है।
महिलाओं में गुस्से की बड़ी वजह ‘मेंटल लोड’
इस विषय पर गहराई से किए गए शोध में यह बात भी सामने आई है कि महिलाओं में लगातार आने वाले गुस्से की एक बहुत बड़ी और मुख्य वजह ‘मेंटल लोड’ (Mental Load) यानी मानसिक बोझ है। मेंटल लोड का सीधा अर्थ उन अदृश्य और अनगिनत जिम्मेदारियों से होता है, जिन्हें रोजाना निभाने में अत्यधिक मानसिक ऊर्जा खर्च होती है, लेकिन विडंबना यह है कि इन पर अक्सर परिवार के किसी भी सदस्य का ध्यान नहीं जाता।
पूरे घर की व्यवस्था को संभालना, बच्चों की पढ़ाई और छोटी-बड़ी जरूरतों का ख्याल रखना, पूरे परिवार के भविष्य की योजनाएं बनाना और हर परिस्थिति में भावनात्मक संतुलन बनाए रखने जैसी अनेक जटिल जिम्मेदारियां आज भी ज्यादातर महिलाओं के कंधों पर ही होती हैं। वक्त बीतने के साथ-साथ यह अदृश्य दबाव गंभीर मानसिक थकावट और भावनात्मक बर्नआउट (पूर्ण मानसिक अवसाद की स्थिति) में तब्दील हो जाता है। जब दिमाग में यह तनाव लगातार बढ़ता रहता है, तब एक वक्त ऐसा आता है कि घर की कोई बेहद छोटी-सी बात या मामूली घटना भी बहुत तीखी और उग्र प्रतिक्रिया का कारण बन जाती है।
बेबसी, हताशा और अनदेखी का खतरनाक परिणाम
आधुनिक मनोविज्ञान इस कड़वी सच्चाई को भी उजागर करता है कि जब किसी व्यक्ति को यह अहसास होने लगे कि उसकी राय या मशवरे को कोई महत्व नहीं दिया जा रहा है, या फिर घर-परिवार के जरूरी फैसलों में उसकी भागीदारी शून्य कर दी गई है, तो उसके अंतर्मन में बेबसी और हताशा की भावना बहुत तेजी से जन्म लेती है। यही नकारात्मक भावना धीरे-धीरे रोजमर्रा के व्यवहार में चिड़चिड़ाहट और फिर गंभीर गुस्से का रूप ले लेती है।
उदाहरण के लिए, जब कोई पत्नी अपने पति या परिवार से यह शिकायत करती है कि उसकी बात नहीं सुनी जाती, तो वह अक्सर किसी एक तात्कालिक घटना की बात नहीं कर रही होती। बल्कि वह लंबे समय से अपने ही घर में महसूस की जा रही उपेक्षा और अकेलेपन की ओर इशारा कर रही होती है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक मानसिक तनाव की स्थिति में इंसान का अपनी ही भावनाओं पर से नियंत्रण पूरी तरह कमजोर पड़ सकता है। ऐसी गंभीर स्थिति में कुछ लोग अपने गुस्से को लगातार भीतर ही भीतर दबाकर रखने की कोशिश करते हैं, जो बाद में किसी दिन बहुत बड़े भावनात्मक विस्फोट या झगड़े के रूप में सामने आता है। वहीं दूसरी ओर, कुछ लोग अपनी इस घुटन को व्यक्त करने के लिए सामने वाले पर तीखे तंज कसने, पूरी तरह चुप्पी साध लेने या फिर अचानक बेहद उग्र प्रतिक्रिया देने का रास्ता अपना लेते हैं। इसलिए गुस्से को सिर्फ एक खराब आदत मानने के बजाय उसके पीछे छिपे असली मानसिक कारणों को समझना बेहद जरूरी है।
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