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झारखंड का कड़वा सच: अपार संपदा के बाद भी ‘पलायन’ को मजबूर हैं मजदूर

Hazaribagh: अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर जहां पूरे देश में श्रमिकों के अधिकारों और उनके सम्मान के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं झारखंड का श्रमिक वर्ग आज भी एक कड़वी हकीकत से जूझ रहा है। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी

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Hazaribagh: अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर जहां पूरे देश में श्रमिकों के अधिकारों और उनके सम्मान के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं झारखंड का श्रमिक वर्ग आज भी एक कड़वी हकीकत से जूझ रहा है। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी झारखंड के हजारों मजदूर स्थानीय स्तर पर रोजगार न मिलने के कारण पलायन का दंश झेलने को मजबूर हैं।

प्राकृतिक संसाधन प्रचुर, पर उद्योगों का सूखा

झारखंड को प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य माना जाता है, लेकिन यहां बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियों और उद्योगों का अभाव एक बड़ी समस्या बनी हुई है। राज्य में न तो पर्याप्त बड़ी फैक्ट्रियां लगीं और न ही व्यापक औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए, जिसका सीधा खमियाजा यहां के गरीब मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है।

परदेस में पसीना बहाने की मजबूरी

हजारीबाग जिले सहित राज्य के सैकड़ों गांवों से हर साल मजदूरों का बड़ा जत्था मुंबई, दिल्ली, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों का रुख करता है। वहां ये श्रमिक निर्माण कार्य, होटल, ट्रांसपोर्ट और फैक्ट्रियों में कड़ी मेहनत कर अपने परिवार का पेट पालते हैं। मजदूरों का कहना है कि बाहर जाकर कठिन परिस्थितियों में काम करना उनकी पसंद नहीं बल्कि मजबूरी है, क्योंकि अपने ही गांव और राज्य में रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं हैं।

स्थानीय रोजगार की दरकार

मजदूर दिवस पर यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि आखिर झारखंड के मजदूरों को अपने ही घर में सम्मानजनक काम कब मिलेगा। विशेषज्ञों और श्रमिकों का मानना है कि यदि सरकार स्थानीय स्तर पर उद्योगों को बढ़ावा दे, नए कारखाने स्थापित करे और कौशल विकास पर जोर दे, तो पलायन की इस गंभीर समस्या पर लगाम लगाई जा सकती है। आज जरूरत केवल सम्मान देने की नहीं, बल्कि उनके स्थायी रोजगार और सुरक्षित भविष्य के लिए ठोस कदम उठाने की है।

– मजदूर दिवस विशेष

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