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Guwahati | एजेंसी —
असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या मंदिर भारतीय अध्यात्म और संस्कृति का एक ऐसा अनूठा केंद्र है, जिसकी महिमा निराली है। यह 51 शक्तिपीठों में से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां देवी सती का ‘योनि’ भाग गिरा था। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि ‘योनि’ स्वरूप के विग्रह की पूजा होती है, जो प्राकृतिक जलधारा से सदैव सिक्त रहता है।
अंबुबाची मेला: जब प्रकृति और आस्था मिलती है — हर साल जून के महीने में यहां विश्व प्रसिद्ध अंबुबाची मेला आयोजित होता है। मान्यता है कि इस दौरान मां कामाख्या ‘रजस्वला’ होती हैं, जिसके कारण तीन दिनों के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। चौथे दिन जब कपाट खुलते हैं, तो भक्तों को ‘रक्त वस्त्र’ (लाल कपड़ा) प्रसाद के रूप में दिया जाता है। इस प्रसाद को पाने के लिए देश-दुनिया के श्रद्धालुओं में होड़ मच जाती है। तंत्र साधना में रुचि रखने वालों के लिए यह समय सबसे महत्वपूर्ण होता है, जब अघोरी और तांत्रिक अपनी गुप्त सिद्धियों को जाग्रत करते हैं।
दर्शन नहीं, ‘स्पर्श’ का है विशेष महत्व — कामाख्या मंदिर की पूजा पद्धति अन्य मंदिरों से एकदम भिन्न है। यहां गर्भगृह में स्थित जलयुक्त योनि-कुंड को स्पर्श करने का विशेष महत्व है। भक्त उस पवित्र जल को अपने साथ घर ले जाते हैं और उसे हर शुभ कार्य में सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं।
सियासत की ‘शक्ति’ का केंद्र धार्मिक आस्था के साथ-साथ कामाख्या मंदिर राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद प्रभावशाली हो गया है। असम के लगभग 65 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं की सांस्कृतिक जड़ें इस मंदिर से जुड़ी हैं। यही कारण है कि चुनावी बिगुल बजने से पहले या बड़े राजनीतिक फैसलों के बाद दिग्गज नेताओं का यहां तांता लगा रहता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेताओं के अलावा प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य विपक्षी नेता भी यहां अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मपुत्र घाटी की अधिकांश सीटों पर इस मंदिर का गहरा प्रभाव है, जिससे यह अब एक रणनीतिक ‘शुभारंभ स्थल’ बन चुका है। दिग्गज कारोबारी मुकेश अंबानी जैसे नामचीन चेहरे भी यहां नियमित रूप से माथा टेकने आते हैं।
इतिहास और पुनर्निर्माण — ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस मंदिर का मूल निर्माण 8वीं-9वीं शताब्दी के आसपास हुआ था। विदेशी आक्रमणों के दौरान इसे काफी क्षति पहुंची, जिसके बाद कोच राजाओं ने इसका भव्य पुनर्निर्माण कराया। आज यह मंदिर न केवल असम की पहचान है, बल्कि पूरे भारत की आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक बनकर उभरा है।
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