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सोशल मीडिया से मिठाई तक: ‘लिम्बिक कैपिटलिजम’ का जाल

New Delhi: नशे का मतलब अब सिर्फ शराब या सिगरेट नहीं रह गया है। आज की दुनिया में मोबाइल स्क्रीन, मीठा खाना और लगातार ऑनलाइन बने रहना भी एक तरह की लत बनता जा रहा है। विशेषज्ञ इसे “लिम्बिक कैपिटलिजम” का दौर बता रहे हैं,

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New Delhi: नशे का मतलब अब सिर्फ शराब या सिगरेट नहीं रह गया है। आज की दुनिया में मोबाइल स्क्रीन, मीठा खाना और लगातार ऑनलाइन बने रहना भी एक तरह की लत बनता जा रहा है। विशेषज्ञ इसे “लिम्बिक कैपिटलिजम” का दौर बता रहे हैं, जहां कंपनियां हमारे दिमाग के उस हिस्से को निशाना बनाती हैं जो खुशी और भावनाओं को नियंत्रित करता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक एक आम व्यक्ति रोज औसतन 2 घंटे 23 मिनट सोशल मीडिया, ऑनलाइन शॉपिंग या ट्रेंडिंग वीडियो देखने में बिताता है। हर ‘लाइक’ और ‘फॉलो’ पर मिलने वाला छोटा सा सुख दिमाग में डोपामाइन रिलीज करता है। यही रसायन हमें बार-बार उसी चीज की ओर खींचता है। धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है।

इसी तरह जंक फूड, मीठी चीजें और हाई-कैलोरी स्नैक्स भी शरीर में डोपामाइन बढ़ाते हैं। खाने के बाद अच्छा महसूस होता है, लेकिन बार-बार यही चक्र दोहराने से मोटापा और दूसरी बीमारियां बढ़ने लगती हैं। दिलचस्प बात यह है कि पहले हाई-कैलोरी फूड बेचे जाते हैं, फिर वजन घटाने की दवाएं और सर्जरी का बाजार तैयार होता है।

मस्तिष्क का लिम्बिक सिस्टम हमारी भावनाओं और सुख की अनुभूति से जुड़ा है। जब इसे बार-बार उत्तेजित किया जाता है, तो दिमाग का फ्रंटल कॉर्टेक्स, जो फैसले और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है, कमजोर पड़ने लगता है। यही वजह है कि कई लोग जानते हुए भी मोबाइल कम नहीं कर पाते या जंक फूड छोड़ नहीं पाते।

चिंता की बात यह है कि आदतें अक्सर बचपन में ही बनती हैं। कंपनियां छोटे बच्चों को टारगेट करती हैं, ताकि वे लंबे समय तक उपभोक्ता बने रहें। इतिहास में तंबाकू के खिलाफ बड़े अभियान चले, लेकिन डिजिटल लत से लड़ाई ज्यादा जटिल है, क्योंकि तकनीक अब पढ़ाई, काम और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

कुछ देश किशोरों के स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन समाधान आसान नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जागरूकता, सीमित उपयोग और संतुलित जीवनशैली ही इससे बचाव का रास्ता है।

संक्षेप में, आधुनिक बाजार अब सिर्फ सामान नहीं बेच रहा, बल्कि आदतें गढ़ रहा है। सवाल यह है कि हम अपनी पसंद से जी रहे हैं या किसी डिजाइन किए गए चक्र में फंसे हैं।

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