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Ranchi News: झारखंड राज्य ने हाल ही में अपनी स्थापना की 25वीं वर्षगांठ बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई, लेकिन इस जश्न के बीच राज्य के लेखक, कलाकार और रंगकर्मी खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस कर रहे हैं। साहित्य, ललित कला और संगीत नाटक अकादमियों के गठन को लेकर लंबे समय से उठ रही मांग को पिछले वर्ष कैबिनेट से मंजूरी तो मिल गई थी, लेकिन ढाई महीने बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं दिख रही है।
राजधानी रांची समेत पूरे राज्य के सांस्कृतिक जगत में अब निराशा का माहौल है। कलाकारों का कहना है कि सरकार के फैसले के बावजूद अकादमियों का विधिवत गठन न होना शासन की उदासीनता को दर्शाता है। जिन संस्थाओं से भाषा, साहित्य और कला को संरक्षित और प्रोत्साहित किया जाना था, वे अब भी सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।
सांस्कृतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी राज्य की असली पहचान केवल सड़कों, पुलों और इमारतों से नहीं बनती, बल्कि वहां की कला, संस्कृति और रचनात्मक अभिव्यक्ति से बनती है। झारखंड के पास हजारों वर्षों पुरानी लोक कलाएं, समृद्ध जनजातीय भाषाएं और अनूठी सांस्कृतिक विरासत मौजूद है। इन मौखिक परंपराओं को लिपिबद्ध करना और उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना अकादमियों के बिना संभव नहीं है।
एक वरिष्ठ कथाकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जिस राज्य का निर्माण ही भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए हुए आंदोलन से हुआ, वहां आज तक साहित्य और कला की अकादमियों का न होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कैबिनेट की मंजूरी के बाद भी जनजातीय भाषाओं के संरक्षण की प्रक्रिया ठप पड़ी है, जिससे साहित्यकार और कलाकार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
रंगकर्मियों का भी यही कहना है कि अकादमियों के अभाव में झारखंड की प्रतिभाएं दबकर रह गई हैं। राज्य में राष्ट्रीय स्तर के रंगकर्मी, चित्रकार और लोक कलाकार मौजूद हैं, लेकिन उन्हें न तो स्थायी मंच मिल पा रहा है और न ही संस्थागत सहयोग। अगर संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी सक्रिय होती, तो शास्त्रीय संगीत, लोक नृत्य और रंगमंच को नई दिशा मिलती।
कलाकारों का मानना है कि अकादमियों के गठन से न सिर्फ सांस्कृतिक गतिविधियों को गति मिलेगी, बल्कि युवा पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए प्रेरित होगी। फिलहाल, राज्य के सांस्कृतिक जगत की निगाहें सरकार पर टिकी हैं कि वह अपने ही कैबिनेट फैसले को कब अमल में लाती है और झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती देती है।

