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Koderama News: कोडरमा प्रखंड के प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी जगन्नाथ प्रसाद की 34वर्षों की सेवा के बाद सेवा निवृति के पश्चात प्रखंड के शिक्षकों के द्वारा विदाई सह सम्मान समारोह का आयोजन सी एच उच्च विद्यालय कोडरमा के प्रांगण में किया गया । इस कार्यक्रम में काफी संख्या में शिक्षक शिक्षिका उपस्थित हुए। शिक्षकों ने स्कूल के गेट से प्रांगण तक पुष्प वर्षा कर उन्हें मंच पर आसन ग्रहण कराया । एवं बुके देकर तथा पुष्प माला पहनाकर उनका स्वागत किया। शिक्षक अजीत आजाद के स्वागत गीत ने मनोरम समा बांध दिया।मंच का संचालन करते हुए शिक्षक अश्विनी तिवारी ने बी ई ई ओ जगन्नाथ प्रसाद का जीवन परिचय कराते हुए बताया कि ये शिक्षक एवं शिक्षा पदाधिकारी के रूप में कोडरमा ही नहीं हजारीबाग एवं चाईबासा सहित कई जिलों में समर्पित भाव से सेवा देकर झारखंड के शैक्षणिक परिदृश्य में सकारात्मक परिवर्तन लाए हैं।कोडरमा जिला में शिक्षकों ,अभिभावकों एवं छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय पदाधिकारी के रूप में ख्याति अर्जित की ।
मंच पर आसन पूर्व निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी उमेश प्रसाद सिंह एवं सी एच के प्राचार्य कृष्ण कांत तिवारी ने इनके व्यवहार कुशलता,कर्तव्यनिष्ठा, मैनेजमेंट कौशल की भूरि भूरि प्रशंसा की। शिक्षक सुदीप सहाय ने अभिनंदन पत्र के माध्यम से प्रखंड के शिक्षकों के भावों को व्यक्त किया एवं इनकी धर्मपत्नी सूर्यमणि देवी के समर्पण का अभिनंदन किया। तत्पश्चात अभिनंदन पत्र इन्हें भेंट स्वरूप प्रदान किया गया।
उपस्थित शिक्षक शिक्षिका रामचंद्र ठाकुर,मनोज चौरसिया, अजीत आजाद,विजय कुमार, कंचन लता बरनवाल,विनोद गुप्ता,संगीता साहनी,खालिद अनवर,इरशाद आलम,गायत्री सिंह,साधना माथुर ,निशांत केतु,प्रवीण सिंह,शीला कुमारी,बसंती पाण्डेय ,संजीत भारती ,स्मिता बरनवाल ने इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कई अनछुए पहलुओं से लोगों को अवगत कराया ।। एवं इनके आगे के स्वस्थ तथा सुखमय जीवन की कामना की।
इनके सम्मान में अजीत आजाद,संजीत भारती , कंचनलता बरनवाल,संगीता साहनी,साधना माथुर के विदाई गीतों ने माहौल को भावुक बना दिया।इस मौके पर प्रखंड के शिक्षकों ने श्रद्धापूर्वक उपहार भेंट किए एवं साथ में सहभोज का आनंद लिया।
अपनी 34वर्षों की सेवाकाल के संस्मरणों को साझा करते हुए जगन्नाथ प्रसाद ने कहा कि वे बच्चों को भगवान का स्वरूप मानते हैं क्योंकि उनकी शिक्षा के लिए हमारी नियुक्ति हुई । जिसके कारण हमें वेतन मिलता है।यदि बच्चे नहीं हों तो ना शिक्षक होंगे ना ही शिक्षा पदाधिकारी।इसलिए बच्चों को ही मंदिर,मस्जिद गुरुद्वारा,चर्च मानकर उनकी सेवा करना, उन्हें काबिल बनाना ही परम ध्येय होना चाहिए।उन्होंने कहा कि अब मेरा शेष जीवन समाज एवं राष्ट्र के हित में शिक्षा के प्रचार प्रसार में लगेगा।मै अपने मूल कार्य शिक्षण का कार्य करता रहूंगा।

