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रांची: सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति का दिन अक्सर कर्मचारियों के लिए भविष्य की चिंताएं लेकर आता है, लेकिन रांची जिला प्रशासन ने इस परंपरा को बदलकर ‘सम्मान और समाधान’ की एक नई इबारत लिखी है। बुधवार को रांची समाहरणालय के ब्लॉक-ए स्थित कॉन्फ्रेंस कक्ष में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जो प्रशासनिक संवेदनशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिला दंडाधिकारी सह उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री की अध्यक्षता में ‘पेंशन दरबार सह सेवानिवृत्ति विदाई सम्मान समारोह’ का आयोजन किया गया।
सम्मान के साथ समाधान का ‘पेंशन दरबार’
आमतौर पर पेंशन और अन्य लाभों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने वाले कर्मचारियों के लिए यह दिन ऐतिहासिक रहा। कार्यक्रम का सबसे मुख्य और खास आकर्षण यह था कि जिले के सेवानिवृत्त हो रहे शिक्षकों को उनके विदाई के दिन ही सभी पेंशनरी लाभ प्रदान कर दिए गए। डीसी मंजूनाथ भजंत्री ने खुद आगे बढ़कर कुल 12 शिक्षकों, एक प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी और एक आदेशपाल को स्मृति चिह्न, शॉल और प्रशस्ति पत्र भेंट कर सम्मानित किया।
“शिक्षक ही समाज के असली शिल्पी”
शिक्षकों के योगदान को याद करते हुए डीसी भजंत्री ने भावुक अंदाज़ में कहा, “शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि वे समाज के निर्माणकर्ता होते हैं। उनके संघर्ष और समर्पण से ही आने वाली पीढ़ियां मजबूत और संस्कारित बनती हैं।” उन्होंने प्रशासन की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि रिटायरमेंट के ठीक उसी दिन सारे लाभ प्रदान करना कोई एहसान नहीं, बल्कि शिक्षकों के प्रति हमारा सम्मान और कर्तव्य है। डीसी ने विदा हो रहे गुरुजनों को सलाह दी कि वे इस नई पारी में समाज सेवा से जुड़े रहें और अपने स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें।
इन हस्तियों का हुआ सम्मान
सम्मान पाने वालों में तमाड़ की BEEO शांति मुनी तिर्की, रा.म.वि. गाड़ी की सुशीला खाखा, हटिया की शबाना परवीन, ओरमांझी के रामेश्वर महतो, रातू के अजय कुमार मिश्र, नगड़ी के प्रदीप कुमार गुप्ता, चान्हो के त्रिलोचन महतो, बेड़ो के संजय कुमार चौरसिया, लापुंग के शंकर खलखो व विराज केरकेट्टा, अनगड़ा की लक्ष्मी देवी, मांडर की थेओदोरा एक्का, डोरंडा के विलियम तिर्की और अनगड़ा के आदेशपाल बाहा उरांव शामिल थे।
प्रशासनिक पारदर्शिता की नई मिसाल
इस सफल आयोजन के पीछे जिला शिक्षा अधीक्षक बादल राज और उनकी टीम की कड़ी मेहनत रही, जिसे डीसी ने विशेष रूप से सराहा। यह आयोजन संदेश देता है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो सरकारी फाइलों की धूल झाड़कर कर्मचारी के हक को उसके द्वार तक पहुंचाया जा सकता है। ऐसे कार्यक्रमों से न केवल वर्तमान कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और संवेदनशीलता की छवि भी जनता के बीच मजबूत होती है।

