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Hazaribagh : हजारीबाग में आयोजित भव्य “अताए-ए-रसूल ﷺ कॉन्फ्रेंस” ने धार्मिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक जगत में विशेष छाप छोड़ी। यह आयोजन न केवल इस्लामी शिक्षाओं की गहराई को उजागर करने वाला रहा, बल्कि आपसी प्रेम, सौहार्द और मानवता के संदेश को भी मजबूती से सामने लाया। सम्मेलन में सिरत-ए-रसूल ﷺ, इस्लाम की मूल शिक्षाओं और विशेष रूप से हजरत ख्वाजा गरीब नवाज रहमतुल्लाह अलैह की दीनि व रूहानी सेवाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
कॉन्फ्रेंस में उलेमा, मशाइख, बुद्धिजीवी, लेखक, शोधकर्ता और बड़ी संख्या में आम लोगों की उपस्थिति रही। इस अवसर को और भी यादगार बनाते हुए प्रसिद्ध पुस्तक “अताए-ए-रसूल ﷺ” का विधिवत विमोचन किया गया। यह पुस्तक ख्वाजा गरीब नवाज़ की जीवन यात्रा, उनके आध्यात्मिक प्रभाव, सामाजिक योगदान और मानवतावादी दृष्टिकोण पर आधारित एक महत्वपूर्ण शोधात्मक कृति है। पुस्तक के लेखक डॉ. जमाल अहमद ने कहा कि यह रचना दरअसल उस रूहानी विरासत का दस्तावेज़ है, जो रसूल-ए-पाक ﷺ की शिक्षाओं के रूप में ख्वाजा गरीब नवाज के माध्यम से उपमहाद्वीप में फैली।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि ख्वाजा गरीब नवाज ने अपने आचरण, चरित्र और व्यवहार से इस्लाम की सच्ची तस्वीर पेश की। उनकी शिक्षाओं में प्रेम, सहिष्णुता, समानता और अंतरधार्मिक सद्भाव का संदेश निहित है, जिसने गंगा-जमुनी तहज़ीब को मजबूत आधार प्रदान किया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के शैक्षणिक और वैचारिक सम्मेलन आज की युवा पीढ़ी को नैतिक मूल्यों और सकारात्मक सोच से जोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं।
सभा के अध्यक्ष ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि “अताए-ए-रसूल ﷺ” जैसी पुस्तकें केवल ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि आत्मिक और नैतिक प्रशिक्षण का सशक्त माध्यम भी हैं। उन्होंने कहा कि जहां भाषण विचारों को सीधे दिलों तक पहुंचाने का माध्यम बनता है, वहीं लेखन विचारों को स्थायित्व देता है और आने वाली पीढ़ियों तक ज्ञान को सुरक्षित पहुंचाता है। उन्होंने लेखक को इस महत्वपूर्ण सेवा के लिए बधाई दी और पुस्तक की व्यापक स्वीकृति की कामना की।
सम्मेलन के अंत में सामूहिक दुआ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। बड़ी संख्या में उपस्थित विद्वानों और धर्मगुरुओं ने इसे एक अत्यंत सार्थक, प्रेरणादायी और समाज को जोड़ने वाला आयोजन बताया तथा भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया।

