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Ranchi : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता, महान क्रांतिकारी, पत्रकार और स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का जीवन भारतीय इतिहास का एक उज्ज्वल अध्याय है। उन्होंने न केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज़ उठाई, बल्कि शिक्षा, एकता और सामाजिक सुधार को अपना जीवन मिशन बनाया। छोटानागपुर की धरती रांची, उनके जीवन का वह अहम पड़ाव रही जहां उनके विचारों ने नयी दिशा ली और भारत के सामाजिक ताने-बाने में नई चेतना का संचार किया।
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निर्भीक आवाज
मौलाना अबुल कलाम आजाद अंग्रेजी हुकूमत के सबसे मुखर आलोचकों में से एक थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन को भारत के आम नागरिकों के शोषण और गरीबी के लिए जिम्मेदार ठहराया। आजाद का मानना था कि देश की आजादी केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक मुक्ति का भी प्रतीक होनी चाहिए।
वे अपने समय के उन गिने-चुने मुस्लिम नेताओं में से थे जिन्होंने 1905 में बंगाल विभाजन का विरोध किया और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की अलगाववादी विचारधारा को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने धर्म के नाम पर राजनीति को भारत की एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया और हिन्दू-मुस्लिम एकता को अपना जीवन-दर्शन बना लिया।
क्रांतिकारी गतिविधियों से पत्रकारिता तक की यात्रा
मौलाना आजाद की शिक्षा उन्हें एक साधारण दफ्तर कर्मचारी बना सकती थी, लेकिन उनके भीतर छिपे विचारक और क्रांतिकारी ने उन्हें एक पत्रकार बना दिया। उन्होंने 1912 में अपनी मशहूर उर्दू पत्रिका ‘अल-हिलाल’ की शुरुआत की। यह पत्रिका उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद करने और युवा मुसलमानों को देशभक्ति के लिए प्रेरित करने का सशक्त माध्यम बनी।
‘अल-हिलाल’ ने तत्कालीन भारत के राजनीतिक वातावरण को झकझोर दिया। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने भारतीय मुसलमानों में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावना को जगाया। उनका उद्देश्य था-मुस्लिम समाज को संकीर्णता से निकालकर राष्ट्र की मुख्य धारा में जोड़ना। उनकी लेखनी इतनी प्रखर थी कि ब्रिटिश सरकार ने ‘अल-हिलाल’ को कई बार प्रतिबंधित किया। इसके बावजूद मौलाना ने अपने विचारों से कभी समझौता नहीं किया।
रांची में नजरबंदी और समाजसेवा की नई शुरुआत
अंग्रेजों ने मौलाना आजाद की बढ़ती लोकप्रियता और क्रांतिकारी विचारों से भयभीत होकर उन्हें 1916 से 1919 तक रांची में नजरबंद कर दिया। परंतु रांची की यह नजरबंदी उनके जीवन का सबसे रचनात्मक काल साबित हुआ। रांची में रहते हुए उन्होंने यहां के मुसलमानों की शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति को नजदीक से देखा। समाज में फैले जातिगत मतभेद और अशिक्षा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। परिणामस्वरूप, उन्होंने दो महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना की:-
- अंजुमन इस्लामिया, रांची।
- मदरसा इस्लामिया, रांची।
इन दोनों संस्थानों का उद्देश्य था, मुस्लिम समाज में शिक्षा का प्रसार और सामाजिक एकता को मजबूत करना। आज भी ये दोनों संस्थान रांची में सक्रिय हैं और मौलाना आजाद की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। बताया जाता है कि मौलाना अपनी पत्रिका ‘अल-हिलाल’ छापने वाली मशीन को रांची तक अपने साथ लेकर आए थे, किंतु उनके प्रस्थान के बाद वह मशीन गुम हो गई और अब उसका कोई पता नहीं है।
असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन में भूमिका
जेल से बाहर आने के बाद मौलाना आजाद ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ आवाज बुलंद की और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। खिलाफत आंदोलन उस समय के तुर्की साम्राज्य के समर्थन में था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध करना था।
मौलाना का मानना था कि इस आंदोलन के माध्यम से भारत के हिन्दू और मुस्लिम एक साझा मंच पर आ सकते हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे गांधीजी के सबसे विश्वसनीय सहयोगियों में से एक बने और कांग्रेस की विचारधारा को जनता के बीच लोकप्रिय बनाने में बड़ा योगदान दिया।
शिक्षा के क्षेत्र में अमर योगदान
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मौलाना आजाद को भारत का पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया। 1947 से लेकर 1958 तक उन्होंने 11 वर्षों तक देश की शिक्षा नीति का मार्गदर्शन किया। उनके प्रयासों से भारतीय शिक्षा प्रणाली को नया आयाम मिला। मौलाना आजाद ने शिक्षा को भारत की प्रगति की कुंजी माना। उनके कार्यकाल में कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना हुई, जिनमें शामिल हैं:-
- संगीत नाटक अकादमी (1953)
- साहित्य अकादमी (1954)
- ललित कला अकादमी (1954)
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs)
उन्होंने सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा और 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा का विचार प्रस्तुत किया, जो आगे चलकर भारत की शिक्षा नीति की नींव बनी। उन्होंने कन्या शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, कृषि और तकनीकी शिक्षा पर विशेष बल दिया।
राजनीतिक जीवन और संसद में योगदान
स्वतंत्रता के बाद 1952 में मौलाना आजाद उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद 1957 में वे हरियाणा की गुड़गांव सीट से संसद पहुंचे। संसद में उन्होंने हमेशा शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के मुद्दों को प्राथमिकता दी। उनकी वाणी में ओज, विचारों में गहराई और दृष्टिकोण में दूरदर्शिता थी। वे कहते थे-“शिक्षा किसी राष्ट्र की आत्मा होती है, जो पीढ़ियों को दिशा देती है।”
मौलाना आजाद की विरासत
मौलाना अबुल कलाम आजाद का जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा और एकता ही राष्ट्र निर्माण की असली नींव हैं। रांची से लेकर दिल्ली तक उनकी यात्रा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक जागृति की यात्रा थी।
उन्होंने समाज को यह सिखाया कि धर्म और जाति से ऊपर उठकर देशहित में एकजुट रहना ही सच्ची देशभक्ति है। आज भी रांची के अंजुमन इस्लामिया और मदरसा इस्लामिया उनके सपनों को साकार कर रहे हैं और उनकी विरासत को जीवित रखे हुए हैं।
मौलाना आजाद न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि विचारों के शिल्पी भी थे। एक ऐसे पत्रकार, जिन्होंने कलम से क्रांति की शुरुआत की और एक ऐसे शिक्षक, जिन्होंने शिक्षा को राष्ट्र की आत्मा बना दिया।


अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निर्भीक आवाज
क्रांतिकारी गतिविधियों से पत्रकारिता तक की यात्रा
रांची में नजरबंदी और समाजसेवा की नई शुरुआत
असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन में भूमिका