Ranchi: आज सोशल मीडिया हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। शहर हो या गांव, बच्चे हों या बुज़ुर्ग, हर कोई किसी न किसी प्लेटफॉर्म पर मौजूद है। लेकिन इसके साथ एक चुपचाप बढ़ती चिंता भी है। हमारा व्यवहार कौन देख रहा है, हमारी तस्वीरें और वीडियो कहां जा रहे हैं, और उनका इस्तेमाल कैसे हो रहा है।
अधिकतर विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूज़र्स की हर गतिविधि को ट्रैक करते हैं। अपलोड किया गया फोटो या वीडियो कुछ ही सेकंड में डाउनलोड हो सकता है। अब जब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आम हो चुका है, तो इन्हीं तस्वीरों और वीडियो को बदलकर गलत तरीके से इस्तेमाल करना और भी आसान हो गया है। यही वह पृष्ठभूमि है, जहां रांची से जुड़ा एक भारतीय प्लेटफॉर्म ज़क्टर (Zktor) एक अलग राह दिखा रहा है।
प्राइवेसी सेटिंग नहीं, सिस्टम का हिस्सा
Zktor की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां प्राइवेसी कोई अलग से चुनी जाने वाली सेटिंग नहीं है। इसे सीधे सिस्टम के डिज़ाइन में शामिल किया गया है। यानी यूज़र को यह भरोसा किसी नीति के भरोसे नहीं, बल्कि तकनीक के ज़रिए मिलता है।
Zktor में जो भी संदेश, फोटो या वीडियो अपलोड होता है, वह पूरी तरह एन्क्रिप्टेड रूप में सेव होता है। खास बात यह है कि खुद प्लेटफॉर्म के पास भी उस डेटा को देखने या पढ़ने की तकनीकी क्षमता नहीं होती। इस मॉडल को Zero Knowledge Architecture कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो जैसे आप अपना सामान ऐसे लॉकर में रखते हैं जिसकी चाबी सिर्फ आपके पास है, बैंक के पास भी नहीं।
No-URL तकनीक और महिलाओं की डिजिटल गरिमा
Zktor का एक और अनोखा पहलू है इसकी No-URL Content structure, आमतौर पर सोशल मीडिया पर किसी भी वीडियो या फोटो का एक URL होता है, जिसे कॉपी करके कहीं भी शेयर किया जा सकता है। Zktor में ऐसा नहीं है।
यहां अपलोड किए गए फोटो और वीडियो का कोई बाहरी URL नहीं होता। इसका मतलब है कि कंटेंट को बाहर ले जाना, डाउनलोड करना, दोबारा अपलोड करना या AI से बदलकर गलत इस्तेमाल करना बेहद मुश्किल हो जाता है। खासकर महिलाओं की डिजिटल गरिमा के लिहाज़ से यह सिस्टम-लेवल सुरक्षा एक बड़ी पहल मानी जा रही है।
डेटा-उपनिवेशवाद पर सीधा सवाल
आज का वैश्विक सोशल मीडिया मॉडल डेटा पर टिका है। यूज़र की पसंद, आदतें और व्यवहार ही कमाई का साधन हैं। Zktor इसी व्यवस्था पर सवाल उठाता है। यह प्लेटफॉर्म Zero Behaviour Tracking के सिद्धांत पर काम करता है।
Zktor यह बहस सामने लाता है कि जब DPDP और GDPR जैसे कानून डेटा सुरक्षा की बात करते हैं, तो क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी अपनी तकनीकी संरचना उसी सोच के साथ नहीं बनानी चाहिए?
झारखंड से फ़िनलैंड तक का सफ़र
Zktor को आकार देने वाले Softa के फाउंडर और इसके शिल्पकार सुनील कुमार सिंह का झारखंड से गहरा रिश्ता है। उनका जन्म अविभाजित बिहार के औरंगाबाद क्षेत्र के एक छोटे से गांव में हुआ। बाद में वे दो दशकों से भी अधिक समय तक फ़िनलैंड में रहे।
उन्होंने Zktor में फ़िनलैंड की उन्नत तकनीक, मज़बूत डेटा प्राइवेसी सिस्टम और सामाजिक समानता की सोच को भारत के ग्रामीण और शहरी अनुभवों के साथ जोड़ने की कोशिश की है। गांव-देहात की मुश्किलें हों या महिलाओं की सुरक्षा, हर पहलू को तकनीक के ज़रिए सुलझाने का प्रयास दिखता है।
बिना विदेशी फंडिंग का साहसिक फ़ैसला
Zktor को अलग बनाता है इसका फंडिंग मॉडल। न तो फ़िनलैंड सरकार से कोई ग्रांट ली गई और न ही भारत सरकार से। इसके अलावा विदेशी वेंचर कैपिटल से भी दूरी बनाई गई।
इसका मकसद साफ़ है। प्लेटफॉर्म पर किसी तरह का बाज़ार-प्रेरित प्रोफाइलिंग दबाव न आए और यह किसी कॉरपोरेट या राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रहकर सामाजिक हित में काम कर सके।
दक्षिण एशिया में शुरू हुआ मास बीटा टेस्ट
Zktor अब पूरी तरह तैयार है। इसकी मास बीटा टेस्टिंग भारत के साथ-साथ नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में शुरू हो चुकी है। यह ऐप Google Play Store और Apple App Store दोनों पर उपलब्ध है।
Creators और युवाओं के लिए नए अवसर
Zktor सिर्फ़ प्राइवेसी की बात नहीं करता, बल्कि रोज़गार और कमाई के नए रास्ते भी खोलता है। इसके Monetization मॉडल में Content Creators को सीधा 70 प्रतिशत हिस्सा मिलता है।
इसके Hyperlocal ऑपरेशंस के ज़रिए टियर-2, टियर-3 और टियर-4 शहरों में हज़ारों युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर पैदा होने की संभावना जताई जा रही है।
एक नई बहस की शुरुआत
रांची से उठी यह पहल सिर्फ़ एक ऐप की लॉन्चिंग नहीं है। यह उस सोच को चुनौती है, जिसमें यूज़र का डेटा ही सबसे बड़ा संसाधन माना जाता है। Zktor यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या अब सोशल मीडिया को भरोसे से नहीं, बल्कि तकनीक से सुरक्षित बनाया जाना चाहिए।



