नई दिल्ली: फागुन की मस्ती और रंगों की बौछार के बीच एक सवाल अक्सर जहन में आता है कि आखिर होली पर ज्यादातर लोग सफेद कपड़े ही क्यों पहनते हैं? क्या यह सिर्फ बॉलीवुड फिल्मों का असर है या हमारी परंपराओं में इसकी जड़ें कहीं गहरी जुड़ी हैं? 3 मार्च 2026 को देशभर में मनाई जा रही होली के बीच आइए जानते हैं ‘सफेद लिबास’ के पीछे की वो वजहें जो इसे इस त्योहार का ‘सिग्नेचर कलर’ बनाती हैं।

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शांति और नई शुरुआत का प्रतीक भारतीय संस्कृति में सफेद रंग को हमेशा से शुद्धता, शांति और सादगी से जोड़कर देखा गया है। मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन के साथ ही तमाम बुराइयों का अंत हो जाता है और अगले दिन से नई ऊर्जा के साथ नए हिंदू महीने का आगाम होता है। ऐसे में सफेद रंग पहनना एक नई और सकारात्मक शुरुआत का संकेत माना जाता है।

गर्मी से बचाव और वैज्ञानिक आधार होली का त्योहार उस संधि काल में आता है जब सर्दियां विदा ले रही होती हैं और गर्मियों की आहट शुरू हो जाती है। दिन में धूप का असर बढ़ जाता है। ऐसे में सफेद रंग सूरज की किरणों को परावर्तित (Reflect) कर शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है। चूंकि होली खुले मैदानों में खेली जाती है, इसलिए पसीने और तपिश से बचने के लिए सफेद सूती कपड़े सबसे आरामदायक साबित होते हैं।

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एकता और रंगों का निखार तकनीकी तौर पर देखें तो सफेद एक ऐसा कैनवास है जिस पर हर रंग अपनी पूरी चमक के साथ उभरता है। जब लाल, हरा और गुलाबी गुलाल सफेद कपड़ों पर पड़ता है, तो वह खुशियों की एक सुंदर तस्वीर पेश करता है। सबसे खास बात यह है कि जब होली की मस्ती परवान चढ़ती है, तो रंगों से सराबोर होने के बाद हर व्यक्ति एक जैसा दिखने लगता है। यह ‘समानता’ का प्रतीक है, जहां ऊंच-नीच और भेद-भाव मिटकर सब एक ही रंग में रंग जाते हैं।

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