New Delhi: मौत से पहले उल्टी सांस चलने की बात अक्सर सुनने को मिलती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को ‘चेन-स्टोक्स ब्रीदिंग’ (Cheyne-Stokes Breathing) और कुछ परिस्थितियों में ‘डेथ रेटल’ (Death Rattle) कहा जाता है। यह सांस लेने का एक विशेष पैटर्न है, जो आमतौर पर जीवन के अंतिम चरण में दिखाई देता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यही पैटर्न यदि सामान्य परिस्थितियों में दिखाई दे तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है।
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सामान्य स्थिति में व्यक्ति की सांसें नियमित लय में चलती हैं और छाती तथा पेट समान गति से ऊपर-नीचे होते हैं। लेकिन मृत्यु के निकट पहुंचने पर यह लय धीरे-धीरे बदलने लगती है। व्यक्ति कभी बहुत गहरी और तेज सांस लेता है, फिर सांसें धीमी और कमजोर पड़ जाती हैं। कई बार 10 से 30 सेकंड तक सांस पूरी तरह रुक भी सकती है और इसके बाद फिर अचानक गहरी सांस शुरू हो जाती है। इस दौरान गले या छाती से घरघराहट जैसी आवाज भी सुनाई दे सकती है।
क्यों बदल जाता है सांस लेने का पैटर्न?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई जैविक कारण होते हैं। मृत्यु के करीब पहुंचने पर हृदय की कार्यक्षमता कमजोर होने लगती है, जिससे मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है। इसके कारण मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो सांस लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है, सामान्य रूप से काम नहीं कर पाता और सांसों की लय बिगड़ जाती है।
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इसके अलावा शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ने लगता है, जिससे मस्तिष्क अचानक गहरी सांस लेने का संकेत देता है। जीवन के अंतिम चरण में निगलने की क्षमता भी कम हो जाती है। इससे गले में तरल पदार्थ जमा होने लगता है और सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाज सुनाई देती है, जिसे चिकित्सा भाषा में ‘डेथ रेटल’ कहा जाता है।
क्या इस दौरान व्यक्ति को दर्द होता है?
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इस अवस्था में अधिकांश लोगों को दर्द या घुटन का अनुभव नहीं होता। अंतिम समय में व्यक्ति की चेतना का स्तर काफी कम हो जाता है और शरीर ऐसे रसायन छोड़ता है, जो दर्द की अनुभूति को कम कर देते हैं। इसलिए यह स्थिति देखने वालों को असहज लग सकती है, लेकिन अधिकतर मामलों में मरीज अपेक्षाकृत शांत अवस्था में होता है।
किन बीमारियों में भी दिख सकता है यह पैटर्न?
‘चेन-स्टोक्स ब्रीदिंग’ का वैज्ञानिक वर्णन 19वीं सदी में स्कॉटलैंड के सैन्य चिकित्सक डॉ. जॉन चेन और आयरलैंड के चिकित्सक डॉ. विलियम स्टोक्स ने किया था। बाद में उनके नाम पर इस सांस लेने के पैटर्न को ‘चेन-स्टोक्स ब्रीदिंग’ कहा जाने लगा।
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विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही सांस लेने का पैटर्न सामान्य जीवन में दिखाई दे तो इसे गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत माना जा सकता है। यह गंभीर हृदय विफलता, स्ट्रोक, ब्रेन हैमरेज, सिर की गंभीर चोट, ब्रेन ट्यूमर, फेफड़ों में पानी भरने, गंभीर निमोनिया या अन्य फेफड़ों की बीमारियों के दौरान भी देखा जा सकता है। ऐसे मामलों में बिना देरी किए चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक होता है।
