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Home»India»कभी 1 रुपये कमाने वाली पाबीबेन बनीं इंटरनेशनल एंटरप्रिन्योर
India

कभी 1 रुपये कमाने वाली पाबीबेन बनीं इंटरनेशनल एंटरप्रिन्योर

कच्छ की पाबीबेन रबारी ने कभी दिन का 1 रुपया कमाया था, आज वे अपनी कढ़ाई कला से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी हैं और सैकड़ों महिलाओं को रोजगार दे रही हैं।
By Samsul HaqueSeptember 15, 20253 Mins Read
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India News: गुजरात का कच्छ जिला हमेशा से अपनी अनोखी कला और हस्तकला के लिए पहचाना जाता रहा है। यही धरती है जहां से पाबीबेन रबारी का संघर्ष और सफलता का सफर शुरू हुआ। पाबीबेन का नाम आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंजता है, लेकिन उनकी कहानी बेहद साधारण परिस्थितियों से शुरू हुई थी।

कौन है पाबीबेन रबारी?

पाबीबेन का जन्म कच्छ जिले के कुकडसर गांव में हुआ। बचपन बेहद कठिन था। पिता का साया पांच साल की उम्र में ही उठ गया और परिवार को चलाने की जिम्मेदारी मां के साथ उन पर भी आ गई। स्कूल की पढ़ाई चौथी कक्षा में ही अधूरी रह गई। मां के साथ वे पानी भरने का काम करती थीं और इसके बदले उन्हें सिर्फ 1 रुपया मजदूरी मिलती थी। यही कठिन हालात उनके जीवन की दिशा बदलने वाले साबित हुए।

कम उम्र से ही पाबीबेन ने रबारी भरतकाम यानी पारंपरिक कशीदाकारी सीखना शुरू किया। यह कला उनकी पहचान बन गई। धीरे-धीरे उन्होंने इसमें निपुणता हासिल की और अपनी कला को रोजगार का साधन बना लिया। कभी 1 रुपया कमाने वालीं पाबीबेन आज pabiben.com (पाबी डिजाइन्स प्राइवेट लिमिटेड) की संस्थापक हैं और 300 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार दे रही हैं।

गांव की कढ़ाई पहुंची हॉलीवुड तक

साल 2017 में उन्होंने महज पांच कारीगरों के साथ अपनी उद्यमिता की यात्रा शुरू की थी। आज उनके साथ काम करने वाली महिलाओं की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है। उनके डिजाइन किए हुए बैग, स्लिंग बैग, शॉपिंग बैग और पारंपरिक परिधान अंतरराष्ट्रीय बाजार में पसंद किए जाते हैं। खासकर उनके टोट बैग पर बनी मोर, पतंगिया और वृक्ष की कढ़ाई लोगों का मन मोह लेती है।

पाबीबेन की कढ़ाई कला बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड फिल्मों तक में नजर आई है। उनकी कढ़ाई को वॉशिंग्टन डीसी के टेक्सटाइल म्यूजियम, न्यूयॉर्क के स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट और ताज होटल्स जैसे प्रतिष्ठित स्थानों पर प्रदर्शित किया गया है। स्वीडन की तीन बड़ी ब्रांड्स ने भी उनके प्रोडक्ट्स को अपनाया है।

शार्क टैंक से मिली पहचान

हाल ही में शार्क टैंक इंडिया में भी पाबीबेन ने अपनी पहचान दर्ज कराई। उन्होंने परंपरागत कढ़ाई को ई-कॉमर्स से जोड़कर एक नया मॉडल पेश किया, जिसे देखकर निवेशकों ने उन्हें 50 लाख रुपये का फंड दिया। यह उनकी कला और मेहनत का प्रमाण है।

सैकड़ों महिलाओं को दे रही रोजगार

पाबीबेन का योगदान केवल अपनी सफलता तक सीमित नहीं है। उन्होंने सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बनाए हैं। वे अपने उद्यम के जरिये कच्छ की समृद्ध कढ़ाई परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं। उनकी कहानी केवल उद्यमिता की नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की मिसाल है।

आगामी वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंसेज (VGRC) में भी पाबीबेन जैसी महिलाओं की सफलता की गाथा को मंच मिलेगा। इन कॉन्फ्रेंसेज का मकसद स्थानीय महिलाओं को पारंपरिक कौशल को अपनाने और टिकाऊ रोजगार हासिल करने के लिए प्रेरित करना है। पाबीबेन रबारी की कहानी साबित करती है कि कठिन परिस्थितियां भी अगर हौसले से लड़ी जाएं तो उन्हें अवसर में बदला जा सकता है।

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