Ranchi: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में महात्मा गांधी का योगदान सर्वोपरि है, लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि बापू के जनआंदोलनों को खाद-पानी देने में छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड) की माटी ने एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। 1917 से लेकर 1940 के दौरान महात्मा गांधी ने झारखंड क्षेत्र का लगभग 12 बार दौरा किया। इस दौरान वे न केवल बड़े शहरों तक सीमित रहे, बल्कि दूर-दराज के गांवों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों में जाकर आदिवासियों, मजदूरों, छात्रों और आम नागरिकों से सीधा संवाद स्थापित किया।
गांधीजी का छोटानागपुर से यह गहरा और भावनात्मक जुड़ाव भारत की आजादी से पहले शुरू हुआ और आजादी के बाद भी इस क्षेत्र की चेतना, विचारों और जीवनशैली में रच-बस गया। आइए जानते हैं कि झारखंड के अलग-अलग अंचलों से राष्ट्रपिता का यह संबंध किस प्रकार विकसित हुआ और उसने राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा कैसे बदली।
रांची और चंपारण सत्याग्रह की ऐतिहासिक पटकथा
महात्मा गांधी का झारखंड में पहला आगमन जून 1917 में हुआ था। वे चंपारण के नील किसानों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनाने हेतु बिहार-ओडिशा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड अल्बर्ट गेट से मिलने रांची पहुंचे थे।
रांची के ऐतिहासिक ‘आड्रे हाउस’ (Audrey House) में गवर्नर के साथ बापू की यह वार्ता तीन दिनों तक चली, जिसके बाद चंपारण एग्रेरियन कमेटी का गठन हुआ और सत्याग्रह की पहली बड़ी जीत की नींव पड़ी। इस यात्रा के दौरान बापू अपने मित्र श्याम कृष्ण सहाय के आवास पर ठहरे थे। इसके बाद वे 1917 में ही चार बार रांची आए और कुल मिलाकर उन्होंने यहां कई हफ्तों का समय बिताया।
टाना भगत और बापू: अहिंसा का एक अनूठा और अटूट रिश्ता
झारखंड के आदिवासी समाज, विशेषकर ‘टाना भगतों’ के साथ महात्मा गांधी का संबंध किसी मिसाल से कम नहीं था। 1917 में ही बापू की मुलाकात टाना भगतों से हुई। टाना भगतों ने गांधीजी के अहिंसा, स्वदेशी और सत्य के विचारों को इतनी गहराई से अपनाया कि वे पूरी तरह से गांधीवादी जीवनशैली में ढल गए।
वे केवल खादी के कपड़े पहनते थे, सिर पर सफेद टोपी धारण करते थे और तिरंगा झंडा अपने साथ रखते थे। गांधीजी टाना भगतों की सादगी और निष्ठा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने टाना भगतों को अपना ‘सबसे प्रिय शिष्य’ तक घोषित कर दिया। 1921 के असहयोग आंदोलन और 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में टाना भगतों ने पैदल चलकर बापू के दर्शन किए और अपनी गाढ़ी कमाई से बापू को स्वतंत्रता कोष के लिए थैलियां भेंट की थीं।
जमशेदपुर के मजदूरों और औद्योगिक क्रांति के बीच बापू
1925 में महात्मा गांधी पहली बार देश की पहली इस्पात नगरी जमशेदपुर (टाटानगर) पहुंचे। टाटा स्टील कंपनी और टाटा वर्कर्स यूनियन के बीच श्रम विवाद छिड़ा हुआ था। दीनबंधु सी.एफ. एंड्रयूज के विशेष आग्रह पर गांधीजी जमशेदपुर पहुंचे और प्रबंधन व मजदूरों के बीच सम्मानजनक समझौता कराया।
जे.आर.डी. टाटा और पूरे जमशेदपुर शहर ने बापू का भव्य स्वागत किया था। यहां गांधीजी ने स्पष्ट किया कि श्रम और पूंजी के बीच टकराव के बजाय सहयोग होना चाहिए। इसके बाद वे 1934 और 1940 में भी जमशेदपुर आए, जहां उन्होंने श्रमिकों के कल्याण और खादी के प्रचार-प्रसार पर विशेष जोर दिया।
हजारीबाग, पलामू और संताल परगना की दूरगामी यात्राएं
गांधीजी का मानना था कि जब तक भारत का युवा और ग्रामीण क्षेत्र नहीं जागेगा, तब तक पूर्ण स्वराज का सपना अधूरा है। इसी कड़ी में उन्होंने छोटानागपुर और संताल परगना के विभिन्न जिलों का सघन दौरा किया:
- हजारीबाग और संत कोलंबा कॉलेज (1925): 18 सितंबर 1925 को गांधीजी हजारीबाग पहुंचे और संत कोलंबा कॉलेज के छात्रों को संबोधित करते हुए राष्ट्र निर्माण का पाठ पढ़ाया।
- चाईबासा और खूंटी (1925): कोल्हान क्षेत्र के चाईबासा में बापू ने ‘हो’ जनजाति के लोगों से मुलाकात की। वहीं, रांची लौटते समय खूंटी में उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा के पावन क्षेत्र के मुंडा आदिवासियों से संवाद किया और उनकी आत्मनिर्भर जीवनशैली की प्रशंसा की।
- देवघर, मधुपुर और गिरिडीह (1925): संताल परगना यात्रा के दौरान वे देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचे और वहां की सांस्कृतिक परंपराओं को अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में सराहा। मधुपुर में उन्होंने टाउन हॉल का उद्घाटन किया और गिरिडीह में स्थानीय नागरिकों को स्वदेशी अपनाने का संदेश दिया।
- पलामू और डाल्टनगंज (1927): 11 जनवरी 1927 को बापू ट्रेन से डाल्टनगंज पहुंचे, जहां जनता ने उन्हें स्वराज कोष के लिए राशि भेंट की। उन्होंने वहां मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय का भ्रमण कर शिक्षा के प्रसार पर बल दिया।
1940 का रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन: आजादी का शंखनाद
मार्च 1940 में छोटानागपुर की धरती पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 53वां ऐतिहासिक अधिवेशन रामगढ़ में आयोजित हुआ। मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में हुए इस अधिवेशन में महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे तमाम दिग्गज नेता एकत्र हुए थे।
रामगढ़ में बापू ने खादी एवं ग्रामोद्योग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया और अपने ओजस्वी भाषण से पूरे देश को ‘सविनय अवज्ञा’ और भावी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के लिए तैयार होने का आह्वान किया। इस अधिवेशन के दौरान भीषण बारिश और तूफान के बावजूद आदिवासियों और आम जनता का उत्साह डिगा नहीं, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख दी थीं।
आजादी के बाद और वर्तमान समय में बापू की विरासत
यद्यपि 1948 में महात्मा गांधी का भौतिक शरीर शांत हो गया, लेकिन आजादी के बाद भी झारखंड के जन-मन में बापू की सोच जीवित रही।
- निवारण आश्रम और खादी ग्रामोद्योग: रांची स्थित निवारण आश्रम और विभिन्न जिलों में स्थापित खादी आश्रम आज भी गांधीवादी विचारों और स्वरोजगार की मशाल जलाए हुए हैं।
- पर्यावरण और जल-जंगल-जमीन की रक्षा: गांधीजी का ‘ग्राम स्वराज’ और प्रकृति-केंद्रित जीवन दर्शन झारखंड की पारंपरिक आदिवासी जीवनशैली से मेल खाता है। आज भी झारखंड में जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के लिए होने वाले अहिंसक आंदोलनों में बापू की वैचारिक झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- ऐतिहासिक धरोहरें: रांची का ‘आड्रे हाउस’, वह फोर्ड कार जिससे गांधीजी रामगढ़ गए थे, तथा विभिन्न स्थानों पर उनके स्मृति स्थल आज भी आने वाली पीढ़ियों को बापू के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाते हैं।
छोटानागपुर और झारखंड की पावन धरती केवल गांधीजी के दौरों की गवाह नहीं रही, बल्कि इसने बापू के सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों को धरातल पर चरितार्थ करके दिखाया। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक, झारखंड और राष्ट्रपिता का यह आध्यात्मिक संबंध भारतीय इतिहास का एक अति स्वर्णिम अध्याय है।

रांची और चंपारण सत्याग्रह की ऐतिहासिक पटकथा
जमशेदपुर के मजदूरों और औद्योगिक क्रांति के बीच बापू
1940 का रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन: आजादी का शंखनाद


