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चान्हो के खेतों में सोना उगाएंगे आदिवासी किसान, BAU ने दिया खेती का मंत्र

रांची: झारखंड की मिट्टी अब न सिर्फ धान और मकई, बल्कि ‘पीले सोने’ यानी सोयाबीन की चमक से भी दमकने वाली है। चान्हो प्रखंड के सिलागई गांव में गुरुवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) द्वारा आयोजित एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम ने स्थानीय किसानों के बीच

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रांची: झारखंड की मिट्टी अब न सिर्फ धान और मकई, बल्कि ‘पीले सोने’ यानी सोयाबीन की चमक से भी दमकने वाली है। चान्हो प्रखंड के सिलागई गांव में गुरुवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) द्वारा आयोजित एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम ने स्थानीय किसानों के बीच नई उम्मीदें जगा दी हैं। राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जनजातीय किसानों को सोयाबीन की वैज्ञानिक खेती से जोड़कर उनकी आय दोगुनी करना है।

पोषण और पॉकेट दोनों के लिए वरदान

कार्यक्रम की प्रभारी और वरिष्ठ सोयाबीन प्रजनक डॉ. नूतन वर्मा ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि सोयाबीन केवल एक फसल नहीं, बल्कि एक लाभकारी निवेश है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सोयाबीन न केवल प्रोटीन का सबसे सस्ता और बेहतरीन स्रोत है, बल्कि बाजार में इसकी मांग किसानों के लिए मुनाफे के नए द्वार खोलती है।

वैज्ञानिकों ने दिए सफल खेती के ‘टिप्स’

प्रशिक्षण के दौरान डॉ. अरविंद कुमार सिंह (वरीय वैज्ञानिक) ने खेती की बारीकियों को बहुत ही सरल भाषा में साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे सही किस्म के बीज का चुनाव, बीज उपचार और सही समय पर उर्वरक प्रबंधन करके किसान फसल को कीटों और रोगों से बचा सकते हैं। वहीं, आनुवंशिकी विभाग के डॉ. कमलेश्वर कुमार ने समझाया कि कैसे आधुनिक तकनीक अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

50 जनजातीय किसानों को मिली किट और डायरी

यह कार्यक्रम विशेष रूप से जनजातीय उप-योजना (TSP) के तहत आयोजित किया गया था, जिससे सिलागई के 50 अनुसूचित जनजाति के किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हुए। वैज्ञानिकों ने न केवल भाषण दिए, बल्कि किसानों की शंकाओं का मौके पर ही समाधान किया। कार्यक्रम के अंत में किसानों को सोयाबीन की खेती पर आधारित मार्गदर्शिका, किसान डायरी और अन्य आवश्यक सामग्री वितरित की गई, ताकि वे घर जाकर भी इन जानकारियों का लाभ उठा सकें।

फील्ड ओवरसीयर तीर्थनाथ और अन्य सहयोगियों की मौजूदगी में संपन्न हुआ यह कार्यक्रम झारखंड के कृषि परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव की ओर इशारा करता है। अगर यहाँ के किसान वैज्ञानिक तरीके से सोयाबीन अपनाते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब चान्हो की पहचान सोयाबीन हब के रूप में होगी।

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