रांची: अक्सर कानूनी विवादों और ऐतिहासिक बहसों में सदियों पुराने सरकारी दस्तावेज अचानक जीवंत हो उठते हैं। ब्रिटिश हुकूमत के दौर का ऐसा ही एक 111 साल पुराना आधिकारिक दस्तावेज सामने आया है, जो 3 मई 1913 को प्रकाशित ‘द गजट ऑफ इंडिया’ (The Gazette of India) का हिस्सा है। 2 मई 1913 को जारी नोटिफिकेशन संख्या 550 के जरिए तत्कालीन ब्रिटिश भारत के ‘बिहार और उड़ीसा’ प्रांत में रहने वाले कई पारंपरिक जनजातीय समुदायों के लिए उत्तराधिकार और संपत्ति बंटवारे से जुड़े बेहद अहम कानूनी प्रावधान तय किए गए थे।
क्या था 1913 का नोटिफिकेशन संख्या 550?
ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी इस अधिसूचना में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि बिहार और उड़ीसा प्रांत में निवास करने वाली मुंडा, उरांव, संताल, हो, भूमिज, खड़िया, घासी, गोंड, कांध, कोरवा, कुड़मी/कुरमी, माले सौरिया और पान जनजातियों के अपने पारंपरिक और रूढ़िगत उत्तराधिकार नियम हैं।
अंग्रेजी हुकूमत के मुताबिक, इन आदिम समुदायों की रूढ़िवादी परंपराएं ब्रिटिश संसद द्वारा पारित ‘इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1865’ के प्रावधानों से मेल नहीं खाती थीं। गजट में दर्ज किया गया कि इन समुदायों पर सामान्य उत्तराधिकार अधिनियम को जबरन थोपना अनुचित और अव्यावहारिक होगा।
गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल का ऐतिहासिक निर्णय
इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1865 की धारा 332 के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए भारत के गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल ने इन सभी समुदायों को इस कानून के दायरे से पूरी तरह छूट प्रदान कर दी थी। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस छूट को कानून लागू होने की तारीख से ही भूतलक्षी प्रभाव के साथ प्रभावी माना गया। अधिसूचना में केवल एक अपवाद रखा गया था कि जिन मामलों में सक्षम सिविल कोर्ट पहले ही कोई विपरीत अंतिम फैसला सुना चुकी है, उन पर इस अधिसूचना का असर नहीं पड़ेगा।
आज के संदर्भ में इस दस्तावेज की प्रासंगिकता
वर्तमान दौर में यह गजट नोटिफिकेशन शोधकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर छोटानागपुर क्षेत्र में कुड़मी/कुरमी समुदाय द्वारा स्वयं को अनुसूचित जनजाति की सूची में पुनः शामिल करने की मांग के समर्थन में इस 1913 के गजट को मुख्य ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह दस्तावेज साफ दर्शाता है कि ब्रिटिश काल में औपनिवेशिक प्रशासन भी छोटानागपुर के जनजातीय समुदायों की विशिष्ट सामाजिक संरचना, रूढ़िगत परंपराओं और प्राकृतिक उत्तराधिकार नियमों की स्वायत्तता का सम्मान करने पर विवश था।





