रांची : शरद पूर्णिमा का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है। इस दिन चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है।
दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, इस बार शरद पूर्णिमा पर रेवती और अश्विनी नक्षत्र के साथ हर्षण और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बताया गया है। इन योगों में पूजा-पाठ और शुभ कार्य करना लाभकारी माना जाता है।
शरद पूर्णिमा पर पूजा के शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं।
अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:11 बजे से 11:56 बजे तक
शुभ मुहूर्त: दोपहर 12:58 बजे से 2:23 बजे तक
प्रदोष काल: शाम 5:12 बजे से 7:53 बजे तक
अमृत मुहूर्त: शाम 6:48 बजे से रात 8:23 बजे तक
चांद की रोशनी में खीर रखने की परंपरा
शरद पूर्णिमा की रात लोग खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है। इसलिए चांदनी में रखी खीर को विशेष प्रसाद माना जाता है। हालांकि, इससे बीमारियां ठीक होने या रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं।
माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं। इसलिए इस पर्व को कोजागर पूर्णिमा भी कहा जाता है।
इस दिन भक्त माता लक्ष्मी, भगवान विष्णु और कुबेर देव की पूजा करते हैं। कई लोग रात में जागरण करते हैं और घर में घी का दीपक जलाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।
स्नान, दान और व्रत का भी महत्व
शरद पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान, जरूरतमंदों को दान और व्रत रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजा-पाठ और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
दिए गए विवरण में रात्रि की पूजा रविवार और स्नान-दान की पूर्णिमा सोमवार को बताई गई है। श्रद्धालुओं को पूजा से पहले स्थानीय पंचांग के अनुसार सही तिथि और मुहूर्त की पुष्टि कर लेनी चाहिए।




