Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची के आजाद बस्ती स्थित बोवाइन मीट मार्केट (Bovine Meat Market) को हटाने और तोड़ने की नीयत से जब रांची नगर निगम की टीम शनिवार को लोअर बाजार थाने की पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंची, तो क्षेत्र में भारी तनाव का माहौल बन गया। निगम की इस कार्रवाई की भनक लगते ही स्थानीय दुकानदारों और आम जनता ने इसका कड़ा विरोध करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते स्थिति ऐसी बनी कि स्थानीय जनप्रतिनिधि वार्ड संख्या 16 के वार्ड पार्षद मो सलाहुद्दीन असलम, वार्ड संख्या 17 की वार्ड पार्षद फातमा शमीम, वार्ड संख्या 18 की वार्ड पार्षद आशा गुप्ता और वार्ड संख्या 22 के वार्ड पार्षद मो असलम भी जनता के समर्थन में उतर आए। पार्षदों और स्थानीय नागरिकों ने सड़क पर बैठकर धरना दिया और निगम प्रशासन की इस कार्रवाई के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। जनविरोध और बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए रांची नगर निगम की टीम को बिना किसी तोड़ने या हटाने की कार्रवाई के ही खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
क्या है विवाद की असल वजह: बूचड़खाना और मीट मार्केट का अंतर
इस पूरे घटनाक्रम के बाद स्थानीय लोगों और व्यापार से जुड़े प्रतिनिधियों का स्पष्ट कहना है कि नगर निगम की कार्रवाई पूरी तरह से भ्रामक और जमीनी हकीकत से परे थी। जिस स्थान (आजाद बस्ती) को तोड़ने निगम की टीम पहुंची थी, वह कोई बूचड़खाना (Slaughterhouse / Abattoir) नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थित ‘बोवाइन मीट मार्केट’ (bovine meat market) है।
स्थानीय निवासियों और दुकानदारों ने स्पष्ट किया कि आजाद बस्ती स्थित इस बाजार में पशुओं की हत्या या उनका वध नहीं किया जाता है। यहां केवल आम नागरिकों की सुविधा के लिए और नियमित उपभोग के लिए वैधानिक रूप से लाए गए मांस की बिक्री की जाती है। पशुओं के वध और मांस की केवल बिक्री के बीच एक बड़ा प्रशासनिक और तकनीकी अंतर होता है, जिसे निगम की टीम नजरअंदाज कर रही है।
औपनिवेशिक काल से जुड़ा है इतिहास
ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थानीय अभिलेखों पर नजर डालें तो रांची शहर में पशुओं के वध के लिए अंग्रेजों के जमाने यानी औपनिवेशिक काल से ही दो ही स्थान अधिकृत और स्थापित रहे हैं—कांटाटोली (कुरैशी मोहल्ला) और डोरंडा (कुरैशी मोहल्ला)। इन दोनों स्थानों पर ही ऐतिहासिक रूप से स्लॉटर हाउस (बूचड़खाना) संचालित होते रहे हैं, जहाँ बोवाइन पशुओं की कटाई की प्रशासनिक अनुमति रही है।
जब अंग्रेजों के शासनकाल में ये दोनों बूचड़खाने सफलतापूर्वक स्थापित और संचालित हुए, तो शहर के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले नागरिकों को मांस की खरीदारी के लिए दूर न भटकना पड़े, इसके लिए शहर के अलग-अलग इलाकों में ‘बोवाइन मीट मार्केट’ खोले गए। आजाद बस्ती का मीट मार्केट भी इसी नेटवर्क का हिस्सा है, जो ब्रिटिश शासनकाल से ही निरंतर संचालित होता आ रहा है।
आजादी के बाद भी यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही। जब रांची में नगर पालिका और बाद में रांची नगर निगम की स्थापना हुई, तो निगम प्रशासन ने भी इन बाजारों के संचालन, दुकान आबंटन, लाइसेंस निर्गत करने और तहबाजारी/टैक्स वसूली की अनुमति दी। ऐतिहासिक म्यूनिसिपल रिकॉर्ड्स और नक्शों से यह स्पष्ट होता है कि इन दुकानों और बाजारों को नगर निगम से समय-समय पर स्वीकृति और लाइसेंस मिलते रहे हैं।
हाईकोर्ट के निर्देश और आधुनिक मॉडल की जरूरत
मामला केवल ऐतिहासिक निरंतरता का नहीं है, बल्कि न्यायिक आदेशों का भी है। पूर्व में झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) में दायर जनहित याचिका W.P.(PIL) No. 5768 of 2001 और संबंधित मध्यवर्ती याचिकाओं (I.A. No. 3126 of 2006) में अदालत ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और रांची नगर निगम को आदेश दिया था कि पारंपरिक मीट मार्केट और स्लॉटर हाउस को बंद करने या ध्वस्त करने के बजाय उनका आधुनिकीकरण (Modernization/Upgradation) किया जाए।
अदालत की मंशा यह थी कि पारंपरिक रूप से चले आ रहे इन बाजारों का जीर्णोद्धार और आधुनिकीकरण कर आधुनिक स्लॉटर हाउस और स्वच्छ मीट मार्केट बनाए जाएं। इससे शहर में स्वच्छता बनी रहेगी, पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन सुरक्षित रहेगा, अपशिष्ट (Waste Management) का सही निस्तारण होगा और खुले में मांस बेचने या गंदगी से फैलने वाली बीमारियों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।
हजारों जिंदगियों और आजीविका पर मंडराता संकट
आजाद बस्ती और रांची के अन्य बोवाइन मीट मार्केटों के बंद होने से केवल दुकानों पर ताला नहीं लगेगा, बल्कि इससे एक पूरी सामाजिक-आर्थिक श्रृंखला प्रभावित होगी। इस रोजगार और व्यापार से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोग जुड़े हुए हैं, जो दैनिक वेतनभोगी, विक्रेता, ट्रांसपोर्टर और सहायक के रूप में काम कर अपने परिवारों का पेट पालते हैं।
यदि रांची नगर निगम बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था या आधुनिकीकरण योजना के इन बाजारों को जबरन बंद कराता है या ध्वस्त करता है, तो हजारों परिवार रातों-रात बेरोजगार हो जाएंगे। स्थानीय लोगों का कहना है कि भुखमरी की स्थिति में इन परिवारों के पास पलायन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
इसके सामाजिक दुष्परिणाम भी अत्यंत गंभीर होंगे। इन गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के समक्ष शिक्षा का अधिकार, सामाजिक उत्थान और समता का अधिकार जैसी संवैधानिक बातें बेमानी साबित हो जाएंगी। आजीविका का साधन छीन जाने से एक पूरी पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय हो सकता है।
सकारात्मक समाधान और जनहित में पहल की मांग
स्थानीय निवासियों, व्यापार मंडलों और जन प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार और रांची नगर निगम से संवेदनशील रवैया अपनाने की गुहार लगाई है। मांग की गई है कि:
- नगर निगम और राज्य सरकार इस पूरे मामले पर गहन मंथन करें और बिना सोचे-समझे की जाने वाली तोड़ने की कार्रवाई पर तुरंत रोक लगाएं।
- देश के अन्य राज्यों और प्रमुख शहरों में अपनाए गए आधुनिक ‘मीट मार्केट मॉडल’ का अध्ययन कर रांची में भी उसी तर्ज पर बाजारों का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाए।
- न्यायालय के आदेशों का अनुपालन करते हुए मौजूदा बाजारों का जीर्णोद्धार किया जाए, स्वच्छता मानकों का पालन सुनिश्चित कराया जाए और वर्षों से लंबित पड़े लाइसेंसों का नवीनीकरण (Renewal) किया जाए।
यदि सरकार और प्रशासन एक दूरदर्शी और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सार्वजनिक पहल निकालते हैं, तो इससे न केवल शहर का पर्यावरण और स्वच्छता सुरक्षित रहेगी, बल्कि हजारों मेहनतकश परिवारों का भविष्य और आजीविका भी सुरक्षित रह सकेगी।

औपनिवेशिक काल से जुड़ा है इतिहास
हाईकोर्ट के निर्देश और आधुनिक मॉडल की जरूरत

