रांची: झारखंड राज्य अपने गठन के 26 वर्ष पूर्ण कर 27वें वर्ष के मुहाने पर खड़ा है, लेकिन राज्य के नीति-निर्धारकों के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई आज भी जस की तस बनी हुई है। सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी विकास के नारों के साथ सत्तासीन रहने वाली सरकारों के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों से जुड़े कई अहम मुद्दे आज भी ठंडे बस्ते में पड़े हैं। इनमें सबसे प्रमुख विषय राज्य की सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी चयन और नियुक्ति समितियों में मुस्लिम (अल्पसंख्यक) प्रतिनिधि को अनिवार्य रूप से शामिल करने का था। अफसोसजनक पहलू यह है कि मुख्यमंत्री स्तर से सैद्धांतिक सहमति और विभागीय स्वीकृति मिलने के वर्षों बीत जाने के बावजूद यह पूरी कवायद लालफीताशाही की भेंट चढ़कर रह गई है।
अल्पसंख्यक समाज को मुख्यधारा से जोड़ने और रोजगार के पारदर्शी अवसर मुहैया कराने के जो वादे चुनावों के दौरान भारी-भरकम मंचों से किए गए थे, वे सरकार का कार्यकाल आगे बढ़ने के साथ ही हवा-हवाई साबित होते दिख रहे हैं। न तो प्रशासनिक गलियारों में इस नीति को धरातल पर उतारने की कोई हलचल दिख रही है और न ही जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि विधानसभा अथवा सार्वजनिक मंचों पर इस संवेदनशील विषय को लेकर मुखर हो रहे हैं।
भेदभाव पर रोक और निष्पक्षता की थी मूल सोच
इस नीतिगत पहल की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई थी ताकि राज्य स्तर पर होने वाली किसी भी बहाली प्रक्रिया में मुस्लिम अथवा अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के अभ्यर्थियों के साथ किसी प्रकार का प्रत्यक्ष या परोक्ष भेदभाव न हो सके। अक्सर यह देखा जाता है कि साक्षात्कार और चयन समितियों में समुचित प्रतिनिधित्व न होने के कारण योग्य और प्रतिभावान उम्मीदवार भी गैर-जिम्मेदाराना रवैये या पूर्वाग्रहों के चलते चयन से वंचित रह जाते हैं। यदि चयन समिति में एक अल्पसंख्यक सदस्य मौजूद रहता है, तो पूरी चयन प्रक्रिया में न केवल पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ती है, बल्कि अभ्यर्थियों के भीतर व्यवस्था के प्रति विश्वास भी सुदृढ़ होता है।
डॉ. शाहिद अख्तर की पहल और अन्य राज्यों की नजीर
इस पूरे मामले को सबसे पहले झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. शाहिद अख्तर ने मजबूती से उठाया था। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान देश के कई प्रमुख राज्यों का व्यापक दौरा कर वहां की भर्ती नियमावलियों का गहन अध्ययन किया था। विभिन्न राज्यों में यह स्वस्थ और प्रभावी परंपरा पहले से लागू है कि चाहे भर्ती सरकारी उपक्रम की हो या अर्द्ध-सरकारी/निजी क्षेत्र की, चयन मंडल में एक अल्पसंख्यक प्रतिनिधि की उपस्थिति अनिवार्य की जाती है। इससे उन राज्यों में अल्पसंख्यकों को बिना किसी भेदभाव के मेरिट के आधार पर अपनी काबिलियत साबित करने का बेहतर अवसर मिलता है।
इसी अध्ययन के आधार पर डॉ. अख्तर ने झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा था तथा आयोग के वार्षिक प्रतिवेदन के जरिए भी सरकार से औपचारिक आग्रह किया था कि झारखंड में भी इसी मॉडल को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए।
सीएम की मंजूरी के बाद भी लालफीताशाही में फंसी फाइल
यह तथ्य अत्यंत चौंकाने वाला है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जनहित और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव पर अपनी सैद्धांतिक सहमति पहले ही दे दी थी। इसके बाद कल्याण विभाग ने भी तत्परता दिखाते हुए इसके पक्ष में विधिवत अनुशंसा की और अंतिम अधिसूचना जारी करने के लिए संचिका को कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग को अग्रसारित कर दिया था।
परंतु, सचिवालयी प्रक्रियाओं की भूलभुलैया और नौकरशाही की शिथिलता के कारण यह महत्वपूर्ण फाइल आगे नहीं बढ़ सकी। आलम यह है कि आज तक इस संबंध में न तो कोई संकल्प जारी हुआ और न ही विभागों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए। नतीजतन, कल्याणकारी सोच सरकारी दफ्तरों के बस्तों में धूल फांक रही है और इसका सीधा नुकसान राज्य के लाखों शिक्षित एवं योग्य अल्पसंख्यक युवाओं को उठाना पड़ रहा है।
भागीदारी से ही बदलेगी आर्थिक व सामाजिक तस्वीर
झारखंड में आज भी सरकारी और संगठित गैर-सरकारी क्षेत्र की नौकरियों में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी उनकी आबादी के अनुपात में काफी कम है। यदि चयन समितियों में उन्हें प्रतिनिधित्व मिलता है, तो इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे:
- समान अवसर की गारंटी: साक्षात्कार और अंतिम मूल्यांकन में पूर्वाग्रह खत्म होगा तथा युवाओं का मनोबल बढ़ेगा।
- आर्थिक व सामाजिक उत्थान: नौकरियों में संख्या बल बढ़ने से समाज की क्रय शक्ति, जीवन स्तर और सामाजिक प्रतिष्ठा में सीधा सुधार होगा।
- शिक्षा के प्रति रुझान: जब समुदाय के युवाओं को योग्यता के दम पर नियुक्तियां मिलेंगी, तो परिवारों में उच्च और तकनीकी शिक्षा के प्रति जागरूकता और रुझान और अधिक तीव्र होगा।
राज्य सरकार और जनप्रतिनिधियों को अब बिना किसी विलंब के इस अटके हुए मसले को गंभीरता से लेना होगा। यदि सरकार वास्तव में सर्वहित संकल्प को साकार करना चाहती है, तो कार्मिक विभाग में अटकी इस फाइल को तत्काल मंजूरी देकर गजट में अधिसूचित किया जाना चाहिए, ताकि राज्य के अल्पसंख्यकों को उनका वाजिब संवैधानिक हक और सम्मान प्राप्त हो सके।





