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Home»India»चुनाव आयोग पर उठे गंभीर सवाल: 6000 से अधिक फर्जी फार्म-7 से मतदाता वंचित
India

चुनाव आयोग पर उठे गंभीर सवाल: 6000 से अधिक फर्जी फार्म-7 से मतदाता वंचित

कर्नाटक में फार्म-7 के जरिए हजारों मतदाताओं के नाम फर्जी तरीके से हटाए गए। जानिए कैसे चुनाव आयोग और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की खामियों ने लोकतंत्र को चुनौती दी।
By Samsul HaqueSeptember 8, 20253 Mins Read
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India News: भारतीय लोकतंत्र की नींव निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रणाली पर टिकी है, लेकिन कर्नाटक से एक सनसनीखेज मामला चुनाव आयोग की गंभीर खामियों को उजागर करता है। जांच में पता चला है कि फार्म-7 का दुरुपयोग कर हजारों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से फर्जी तरीके से हटाए गए। यह पूरा खेल महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के मोबाइल नंबरों तथा गरुण एप सहित अन्य प्लेटफॉर्म्स के जरिए पोर्टल से मतदाताओं के नाम काट दिए गए।

कांग्रेस उम्मीदवार बी.आर. पाटिल ने 2018 में आनंद विधानसभा क्षेत्र से 697 वोटों से हार के बाद इस मामले को उठाया था । 2023 में दोबारा चुनाव के दौरान उन्होंने सीआईडी जांच की मांग की थी । जांच में सामने आया कि 6000 से अधिक फार्म-7 गरुण एप्लीकेशन के जरिये दाखिल किए गए, जिनमें से 5994 फर्जी पाए गए। यह फॉर्म राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (NVSP), वोटर हेल्पलाइन और गरुण एप के माध्यम से भरे गए थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन लोगों के मोबाइल से फॉर्म भरे गए, उन्हें एप या प्रक्रिया की जानकारी तक नहीं थी। महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के मोबाइल नंबरों से लॉगिन कर कर्नाटक के मतदाताओं के नाम काटे गए। जिसके कारण वह मतदान से वंचित हो गए। इससे साफ हुआ कि चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली में न तो मल्टीफैक्टर ऑथेंटिकेशन था। नाहि आवेदकों की सही पहचान की कोई व्यवस्था।

जांच एजेंसियों ने चुनाव आयोग से आईपी एड्रेस और अन्य तकनीकी डाटा मांगा, लेकिन चुनाव आयोग से नहीं मिला। कई फॉर्म अधूरे होने के बावजूद चुनाव आयोग ने मंजूर किए, जिससे चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। चुनाव आयोग धोखाधड़ी करने वालों को क्यों बचाना चाहता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मुद्दे को सार्वजनिक करने की कोशिश की, चुनाव आयोग ना जांच कर रहा है, नाहि डाटा दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के चुनावी तंत्र के लिए खतरे की घंटी है। जनता अब पूछ रही है कि क्या वोटरों की सुविधा के नाम पर बनाए गए एप और डिजिटल व्यवस्था वोट चोरी के फर्जीवाड़े का नया माध्यम बन रहे हैं? यदि समय रहते पारदर्शी और सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है। संविधान और संबैधानिक संस्थाओं से लोगों का विश्वास खत्म हो जाएगा।

फिलहाल देशभर की निगाहें कर्नाटक सीआईडी, चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर टिकी हैं, जो वोट काटने के इस रहस्यमय मामले की सच्चाई सामने लाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को फिर से विश्वसनीय और मजबूत बना सकती हैं। चुनाव आयोग द्वारा मामले की जॉच करने के स्थान पर जिस तरह से साइबर फ्राड को दबाने का काम किया जा रहा है। उससे राहुल गांधी और विपक्ष के वोट चोरी के आरोप में चुनाव आयोग की भूमिका भी संदिग्ध हो रही है।

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