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वैज्ञानिकों का महामंथन: वर्षा आधारित खेती पर मंडराते संकट और अलनीनो से निपटने की बनी रणनीति

रांची: झारखंड में बदलती जलवायु और मौसम के अनिश्चित मिजाज से खेती-किसानी को सुरक्षित रखने के लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) ने एक बड़ी पहल की है। विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के तत्वावधान में ‘जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों

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रांची: झारखंड में बदलती जलवायु और मौसम के अनिश्चित मिजाज से खेती-किसानी को सुरक्षित रखने के लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) ने एक बड़ी पहल की है। विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के तत्वावधान में ‘जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर जलवायु के प्रभावों का प्रबंधन’ विषय पर दो दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरूआत हुई। इस कार्यक्रम में राज्य भर के विभिन्न कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के 46 शीर्ष कृषि वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं, ताकि वे किसानों तक मौसम के बदलावों से निपटने की सटीक तकनीकें पहुंचा सकें।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के पहले दिन शुक्रवार को वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए बीएयू के कुलपति डॉ. एससी दुबे ने झारखंड की कृषि व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि झारखंड की लगभग 80 प्रतिशत खेती पूरी तरह से वर्षा पर आधारित है। वर्तमान समय में मौसम के कई प्रमुख कारकों जैसे—बारिश की प्रवृत्ति, तापमान में बढ़ोतरी, हवा की गति और दिशा, वायुमंडलीय दबाव और सूर्य के प्रकाश की तीव्रता में तेजी से उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। ऐसी विषम परिस्थितियों में कृषि वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे इन बदलावों के तत्काल प्रभाव को प्रबंधित करने वाली तकनीकों का किसानों के बीच व्यापक प्रसार करें।

कुलपति डॉ. दुबे ने विशेष रूप से इस वर्ष ‘अलनीनो’ के संभावित प्रभाव और उससे फसलों को होने वाले नुकसान की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने वैज्ञानिकों को अलनीनो से निपटने की रणनीतियां समझाते हुए कहा कि प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए किसानों को उन्नत और परखी हुई तकनीकों से जोड़ना होगा। इसके लिए कम पानी में तैयार होने वाले उचित प्रभेद (किस्मों), फसल विविधीकरण (Crop Diversification) और बुआई व रोपाई के पारंपरिक समय में बदलाव करने जैसी वैज्ञानिक पद्धतियों को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।

कार्यक्रम के दौरान प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. डीके शाही ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसानों को सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी और भूमि की अम्लीयता को सहन करने वाली फसलों की उन्नत किस्मों के बारे में जागरूक करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने जल संसाधनों के विवेकपूर्ण और सही उपयोग पर विशेष जोर दिया।

निदेशक डॉ. शाही ने प्रशिक्षण में मौजूद वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि आगामी 07 जुलाई को पूरे राज्य के सभी कृषि विज्ञान केंद्रों में किसानों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जाए। इस शिविर का मुख्य विषय ‘मौसम में हो रहे बदलाव के वैज्ञानिक समाधान’ होगा, ताकि हमारे किसान पारंपरिक ढर्रे से निकलकर वैज्ञानिक तरीकों से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना कर सकें। तकनीकी सत्र में आनुवंशिकी और पौधा प्रजनन विभाग की अध्यक्ष डॉ. मणिगोपा चक्रवर्ती और आईसीएआर शोध संस्थान, पलाण्डु के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. बालकृष्ण झा ने भी आधुनिक कृषि तकनीकों पर अपनी विस्तृत प्रस्तुतियां दीं।

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