हजारीबाग/अजमेर: सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती (रहमतुल्लाह अलैह) के आस्ताने अजमेर शरीफ में एक गरिमामयी साहित्यिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। दरगाह के मुकद्दस परिसर में डॉ. जमाल अहमद द्वारा लिखित पुस्तक ‘अताए रसूल हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज’ का विधिवत विमोचन किया गया। यह किताब गरीब नवाज की हयात (जीवन), उनकी आध्यात्मिक बुलंदी और मानवता को दिए गए अमूल्य पैगाम को केंद्र में रखकर लिखी गई है।
लेखक डॉ. जमाल अहमद, जो संत कोलंबा कॉलेज उर्दू विभाग के अध्यक्ष हैं, लंबे समय से उर्दू साहित्य के माध्यम से सूफी संतों की तालीम और इंसानियत के पाठ को जन-सामान्य तक पहुंचाने में जुटे हैं। इस मौके पर दरगाह शरीफ के खादिम हज़रात और शहर के कई प्रमुख बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। समारोह में हाजी सैयद एहतेशाम अहमद चिश्ती, सूफी सैयद जौहरुल हसन चिश्ती, सूफी सैयद मोहम्मद अरहम हसन चिश्ती, डॉ. मोहम्मद आशिक खान और डॉ. अब्दुल मन्नान समेत कई गणमान्य शख्सियतों ने शिरकत की।
भारतीय उपमहाद्वीप में सूफी विरासत की प्रासंगिकता
समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि हजरत ख्वाजा गरीब नवाज का भारतीय उपमहाद्वीप के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक इतिहास में अद्वितीय स्थान है। उन्होंने सदियों पहले नफरत के बदले मोहब्बत, भेदभाव की जगह बराबरी और स्वार्थ के बजाय निस्वार्थ मानव सेवा का जो चिराग रोशन किया था, उसकी रोशनी आज भी उतनी ही जरूरी है। उनकी शिक्षाएं किसी एक वर्ग या धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी कायनात के लिए अमन और रहमदिली की राह दिखाती हैं।
उपस्थित विद्वानों ने रेखांकित किया कि यह पुस्तक सूफी परंपरा को केवल मजहबी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि मजबूत साहित्यिक और बौद्धिक नजरिए से सामने लाती है। आज के दौर में, जब समाज को आपसी सौहार्द और सहिष्णुता की सख्त दरकार है, ऐसी किताबें नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध साझी विरासत और मूल्यों से जोड़ने में एक मजबूत पुल का काम करती हैं।
समारोह के समापन पर उम्मीद जताई गई कि डॉ. जमाल अहमद की यह शोधपरक कृति साहित्यकारों, शोधार्थियों और सूफियाना मिजाज रखने वाले तमाम पाठकों के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।





